बचपन

रीती- रीती आँखों से वो

  देख रहा था कनखी से

कंधे पर बस्ता लटकाए

 पढ़ने जाते बच्चों को

गले में टाई, पाँव में जूते, 

पानी की बोतल लेकर

हँसते- गाते, शोर -मचाते,

 अपने जैसे बच्चों को

अपने कपड़े, अपने नंगे पाँव को 

झुककर देखा

अपने कंधे पर लटके 

कूड़े के थैले को फेंका

उल्टे पैरों दौड़ा घर को, 

जाकर मम्मी से बोला

मैं भी पढ़ने जाऊँगा

 दिलवा दो मुझको भी बस्ता

माँ की आँखों से छलके आँसू,

निशब्द होंठ कुछ कह न सके

पर नन्हा बालक समझ गया

 अपनी माँ की लाचारी को

और लौट गया वापस निभाने,

 अपनी जिम्मेदारी को

भूख और सपनों की जंग में,

आग पेट की जीत गयी

हार गयी उम्मीद और 

सपनों की डोरी टूट गई

पढ़ लिखकर कुछ बनने की

 उम्मीद भी पीछे छूट गई,

पढ़ लिखकर कुछ बनने की

 उम्मीद भी पीछे छूट गई


रचयिता

शालिनी शर्मा,

सहायक अध्यापक,
राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय छापुर,
विकास खण्ड-भगवानपुर,
जनपद-हरिद्वार,
उत्तराखण्ड।

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