150/2026, बाल कहानी- 31 अगस्त
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 150/2026
*31 अगस्त 2026 (सोमवार)*
#बाल_कहानी - #रक्षा_का_धागा
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हमेशा की तरह राजू और मुनिया स्कूल से निकलकर घर को चले जा रहे थे। रास्ते में एक छोटा-सा गाँव का बाजार पड़ता था, जहाँ रंग-बिरंगी राखियाँ सजी हुई थी। राजू उत्साहित होता हुआ बोला, "परसों रक्षाबन्धन है। मुनिया! तू मुझे राखी तो बाँधेगी और तूने मेरे लिए राखी खरीद ली ना?"
"हाँ! मैं तुझे राखी भी बाँधूँगी और तेरी पसन्द की मिठाई भी खिलाऊँगी।" मुनिया बोली और इस खुशी में स्कूल से भी छुट्टी में दोनों यही बातें करते घर पहुँच गयीं। दादी ने प्यार से दोनों को लिपटा लिया। रात्रि का भोजन समाप्त होते ही दोनों दादी के पास जा धमके, लेकिन आज राजू जिद करने लगा कि उसे रक्षाबन्धन से ही सम्बन्धित कहानी सुननी है। दादी ने थोड़ी देर सोचा, फिर बोली, "बच्चों! आज मैं तुम्हें चित्तौड़ की महान और वीर रानी कर्णावती की कहानी सुनाती हूँ। बहुत समय पहले की बात है, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ किले की वीराँगना रानी कर्णावती अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करती थी। उनके राज्य में चारों ओर खुशहाली थी। पर एक दिन राज्य पर संकट के काले बादल छा गए। गुप्तचरों ने रानी को सूचना दी कि गुजरात का शासक बहादुर शाह चित्तौड़ पर आक्रमण करने वाला है। खबर सच्ची थी, इसलिए पूरे राज्य में हलचल मच गई। रानी ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने प्रमुख दरबारियों को इकट्ठा किया और ओजस्वी वाणी में कहा, "चित्तौड़ की रक्षा हम अपनी आखिरी साँस तक करेंगे, पर वीर रानी को यह भली-भाँति पता था कि दुश्मन की सेना उनकी सेना से बहुत बड़ी है, संघर्ष आसान न होगा। रानी ने बल के साथ बुद्धि का प्रयोग किया। उस समय भारतवर्ष पर मुगल बादशाह हुमायूँ का शासन था। रानी ने हुमायूँ को अपना भाई बनाकर चित्तौड़ की सहायता लेने का विचार किया। उन्होंने रेशमी धागे से बनी सुन्दर राखी अपने विश्वसनीय दूध वीर सिंह को एक पत्र के साथ सौंप दी। जिसका आशय था कि सम्राट हुमायूँ इस संकट में अपनी बहन कर्णावती की रक्षा करें। राजू खुशी से उछला, "सुन.. मुनिया! अगर तू किसी संकट में फँस जाएगी तो तेरा यह भाई तेरी रक्षा करेगा।" दादी और मुनिया को हँसी आ गई। "हाँ.. नानी..।" फिर आगे मुनिया अधीरता से बोली, "फिर क्या वीर सिंह तपती धूप ऊँचे पहाड़ व घने जंगल लाँघता हुआ सम्राट हुमायूँ के पास जा पहुँचा?" सम्राट हुमायूँ को जब राखी और पत्र मिले तो उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। उन्होंने अपने मन्त्रियों से कहा, "रानी कर्णावती ने मुझे अपना भाई माना है। इस समय मेरा सबसे बड़ा कर्तव्य अपनी बहन की रक्षा करना है।" हुमायूँ ने अपनी विशाल सेना को कूच करने का आदेश दिया। हुमायूँ स्वयं सेना का नेतृत्व कर रहे थे। चारों ओर घोड़े की तापों और नगाड़ों का स्वर गूँज रहा था।.. अब राजू और मुनिया को नींद आ रही थी।
#संस्कार_सन्देश -
रक्षा का धागा सभी भेद-भाव भुलाकर अटूट विश्वास और सुरक्षा का प्रतीक है
रचनाकार-
डॉ० #सीमा_द्विवेदी (स०अ०)
कम्पोजिट विद्यालय कमरौली
जगदीशपुर, अमेठी (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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