143/2026, बाल कहानी- 20 अगस्त
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 143/2026
*20 अगस्त 2026 (गुरुवार)*
#बाल_कहानी - #छत_का_महत्व
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संतोषपुर गाँव में एक परिवार रहता था- खुशीराम और उसकी पत्नी सुखिया तथा दो बेटे सुनील और सुशांत। उनका घर नहीं था। वे लोग झोपड़ी बनाकर जीवन बसर कर रहे थे। घर का मुखिया खुशीराम घर नहीं होने के कारण बहुत चिन्तित रहता था। वह अपनी पत्नी सुखिया से रोज घर बनाने के लिए मशवरा किया करता था लेकिन पैसों की कमी के कारण घर नहीं बना पा रहे थे। अपने बेटों की शादी भी करनी थी, पर छत नहीं होने के कारण कोई भी अपनी बेटी को देना नहीं चाहते थे। खुशीराम ने परिवार के सभी लोगों को बुलाया और कहा कि, "हम चारों रोज मेहनत-मजदूरी करेंगे और एक व्यक्ति के मजदूरी से घर का खर्च पूरा करेंगे और बाकी तीन लोगों की मजदूरी को कुछ सालों तक बैंक में जमा करेंगे।" तब से परिवार के सभी लोग मेहनत-मजदूरी करते थे और एक व्यक्ति की मजदूरी से घर का खर्च और तीन लोगों की मजदूरी को बैंक में जमा करते थे। इस तरह पाँच वर्षों तक मेहनत-मजदूरी करके उन लोगों ने मजदूरी के पैसे को बैंक में जमा किया। उनके दोनों बेटे बड़े हो गए थे। अब उनकी शादी भी करनी थी, लेकिन घर नहीं होने के कारण विवाह नहीं हो रहा था। खुशीराम ने अपनी पत्नी और बच्चों को बुलाया और घर बनाने के सम्बन्ध में चर्चा की और कहा कि, "पहले घर बना लिया जाये, फिर दोनों बच्चों की शादी करेंगे।" खुशीराम की पत्नी सुखिया ने कहा कि, "ऐसा ही करना ठीक रहेगा क्योंकि हमारे पास अभी ढंग का छत नहीं है और ऐसे में कौन हमारे बच्चों के लिए लड़की देगा।
अगले दिन खुशीराम और उसकी पत्नी बैंक गये और घर बनाने के लिए पैसे निकाले। उन्होंने ठेकेदार को कुछ पैसे दिए और घर बनाने को कहा! ठेकेदार द्वारा अगले ही दिन घर बनाने का काम शुरू हो गया। इस तरह करीब एक महीने में उनका स्वयं का घर बन गया। घर पूरी तरह बन जाने के बाद खुशीराम और उसकी पत्नी सुखिया अपने दोनों बच्चों के लिए लड़की ढूँढने लगे। उन्हें समीप के गाँव में ही लड़की मिल गई, पर वहाँ लड़की के पिता ने खुशीराम से अनेक सवाल पूछे? उन सवालों में एक सवाल सबसे महत्वपूर्ण था। वह सवाल था-, "आपका स्वयं का छत है या नहीं?"
खुशीराम और उसकी पत्नी ने डंके की चोट में कहा कि, "हमारा खुद का छत है। बड़ी मेहनत और लगन से बनाया है परिश्रम करके।"
तब जाकर लड़की के पिताजी ने अपनी दोनों बेटियों को खुशीराम के दोनों बेटों के लिए विवाह के लिए 'हाँ' कह दिया। अगले महीने ही दोनों की धूमधाम से शादी की गई। गाँव के सभी लोगों को निमन्त्रण दिया गया था और भण्डारे में सभी लोगों को भोजन कराया गया। खुद का छत होने के कारण ही उनके दोनों बेटे का विवाह सम्पन्न हुआ।
#संस्कार_सन्देश -
छत का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। छत हमें धूप-छाँव, ठण्ड और बरसात से तो बचाता है, साथ ही छत के होने पर हमारी इज्जत भी बढ़ जाती है।
कहानीकार -
प्रेमलाल किशन 'स्नेहिल' (शिक्षक)
शासकीय प्राथ./माध्य.विद्यालय बुढ़नपुर
संकुल केन्द्र गहरीनमुड़ा, विकास खण्ड व जिला-सक्ती छत्तीसगढ़
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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