138/2026, बाल कहानी- 13 अगस्त
दैनिक नैतिक प्रभात - 138/2026
*13 अगस्त 2026 (गुरुवार)*
#बाल_कहानी- #बागबाँ
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आज शनिवार का दिन था। शनिवार को विद्यालय में अतिरिक्त गतिविधियाँ होती हैं। इसी सिलसिले में प्रधान अध्यापक महोदय विद्यार्थियों से उनके भविष्य के सपनों के बारे में पूछ रहे थे, "भविष्य में कौन क्या बनना चाहता है?" सभी बच्चे कोई डॉक्टर कोई इंजीनियर, पुलिस आदि बनने की बात कर रहे थे पर रोहन चुपचाप बैठा था। उसने कुछ नहीं कहा। तब अध्यापक महोदय ने रोहन से पूछा, "रोहन तुम चुप क्यों बैठे हो, क्या तुम कुछ नहीं बनना चाहते? "
"गरीब को सपने देखने का अधिकार नहीं होता सर जी! ऐसे सपने देखने से क्या लाभ जो पूरे ही न हो सकें। मैं बहुत गरीब हूँ। मेरे माता-पिता किसी तरह मेहनत मजदूरी करके हमें पढ़ा रहे हैं। अब आप ही बताइए सर जी! मैं कोई सपना कैसे देख सकता हूँ?"
रोहन की बात सुनकर अध्यापक जी का मन द्रवित हो गया। उन्होंने रोहन को स्नेह से समझाते हुए कहा, "सपनों का गरीबी से कोई लेना-देना नहीं होता। जागती आँखों से जो सपने देखे जाते हैं, वे भविष्य का निर्माण करते हैं।
तुम एक होनहार छात्र हो। जो सोचोगे, वह अवश्य कर दिखाओगे। जहाँ चाह होती है, वहाँ राह भी निकल आती है। ईश्वर कोई न कोई रास्ता अवश्य निकाल देते हैं और फिर मैं तो हूँ तुम्हारी मदद के लिए। कभी भी किसी तरह की परेशानी हो तो तुम मुझे निसंकोच कह सकते हो। अच्छा अब बताओ, तुम क्या बनना चाहते हो?"
रोहन कुछ आश्वस्त होते हुए बोला, "सर जी! मैं तो बागवाँ बनना चाहता हूँ।" अध्यापक निराश होकर बोले, "बागवाँ..!"
"तुम जानते भी हो बागवाँ का मतलब क्या होता है..?"
"जी सर.. अच्छी तरह जानता हूँ। बागवाँ का मतलब होता है बाग की देखभाल करने वाला माली, जो अपनी मेहनत से बगीचे को रंगीन फूलों और फलों से खूबसूरत बना देता है और उन फल-फूलों से न जाने कितने लोगों का भला होता है?"
"पर मैं तो अलग तरह का बागवाँ ही बनना चाहता हूं।"
"अलग तरह का बागवाँ..?"
"हाँ सर जी! यह हमारा प्यारा सा भारत वर्ष भी तो एक बाग जैसा ही है, इसमें कई तरह के धर्म और जाति के रंगीन फूलों से सुसज्जित तथा धरती माँ की हरियाली, खेत और खलिहानों से सजा हुआ हमारा देश भी तो एक बगीचा ही है और मैं एक फौजी रूपी बांगवाँ बनकर इस गुलशन की देखभाल करना चाहता हूँ।. अपने जीवन की आखिरी सांस तक अपने खून से खींचकर मैं अपने इस बाग की रक्षा करूँगा ताकि जीता रहे अपना हिंदोस्ताँ। हाँ सर! मैं सरहद पर तिरंगा फहराना चाहता हूँ।"
अध्यापक अपने इस होनहार छात्र के देशभक्ति से भरे हुए सपने को सुनकर गर्व से भर उठे और पूरा कक्षा तालियों से गूँज उठा।
#संस्कार_सन्देश-
देश सर्वोपरि है। धर्म और जाति सब इससे परे हैं। देशहित पहला धर्म है, हम सबको इसे निभाना चाहिए।
कहानीकार-
#जमीला_खातून
सेवानिवृत्त (प्र०अ०)
प्रा० वि० गढ़धुरिया गंज,
नगर क्षेत्र मऊरानीपुर, झाँसी
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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