139/2026, बाल कहानी- 14 अगस्त
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 139/2026
*14 अगस्त 2026 (शुक्रवार)*
#बाल_कहानी - #देर_आए_दुरुस्त_आए
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दो दोस्त थे। रोहन और मोहन।दोनों में बहुत ही गहरी मित्रता थी। वे सदैव कहीं पर भी जाते तो साथ-साथ जाते, साथ-साथ रहते और साथ ही खेलते। यहाँ तक कि कहीं बाहर घूमने भी जाते। रोहन बहुत ही ज्यादा होशियार और समझदार बच्चा था जबकि मोहन बहुत ही शैतान और बात को न मानने वाला बच्चा था। यद्यपि ऐसा नहीं था कि वह पढ़ाई में पीछे हो, पढ़ाई में वह बहुत ही होशियार था।
एक दिन विद्यालय में एक प्रतियोगिता हुई, जिसमें एक बच्ची ने एक नाटक का मंचन किया, जिसमें सफाई से सम्बन्धित कहानी का चित्रण दिखाया गया था। बच्ची ने कहानी में बोलते हुए बोला, "हमें आँख में अंजन दाँत में मंजन नित कर.. नित कर। लेकिन नाक में उंगली, कान में तिनका, मत कर.. मत कर।" मोहन यह बात सुनकर बहुत हंसा। उस लड़की को बहुत खराब लगा। उसने बोला, "मोहन! तुम क्यों हँस रहे हो?"
मोहन बोला, "मैं इसलिए हँस रहा हूँ क्योंकि मैं तो सिर्फ इसका उल्टा करता हूँ। मैं तो कहता हूँ, "आँख में अंजन, दाँत में मंजन, मत कर.. मत कर लेकिन नाक में उंगली कान में तिनका नित कर।" हमारे कान भी तो गन्दे होते हैं हमें उन्हें भी तो साफ करना चाहिए । नाक भी गन्दी होती है, उसे भी साफ करना चाहिए।.. तुमने यह क्यों बोला कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए।" उसके दोस्त रोहन ने उसे समझाया, "दोस्त मोहन! यह गलत बात है, नाक में दिनभर उंगली हमें नहीं डालनी चाहिए और न ही कान में उटपटाँग चीज डालनी चाहिए। कभी-कभी कष्टप्रद भी हो जाता है।" लेकिन मोहन ने बात को नहीं माना और वह एक दिन रास्ते में उसको कान में आदत पड़ चुकी थी, खुजली मची, उसने सोचा कि क्या करें? तब उसे रास्ते में टहनी मिली और उसे कान में डालकर खुजाने लगा। थोड़ी देर में उसके कान में बहुत तेज दर्द होने लगा और वह चिल्लाने लगा। तब सब लोग ने पूछा, "क्या हो गया.. क्या हो गया?" तो उसने बताया, "मैं एक टहनी से कान को खुजला रहा था, तो कान से खून बहने लगा।" लोग उसको डॉक्टर के पास लेकर गये। उसके कान में बहुत गहरा जख्म हो चुका था। यहाँ तक की कान का पर्दा भी खराब हो गया था। अब उसे एक कान से सुनाई भी नहीं दे रहा था । तब सब ने समझाया, "इसीलिए ऐसा कहा जाता है, कि आँख में अंजन, दाँत में मंजन नित कर, लेकिन नाक में उंगली, कान में तिनका मत कर।" अब मोहन को बात समझ आ चुकी थी और उसने सबसे बहुत क्षमा माँगी कि, "मुझे किसी तरह ठीक कर दो अब मैं आगे से ऐसा नहीं करूँगा।" डॉक्टर ने किसी तरह उसके कान को ठीक कर दिया और वह उसके बाद से खुद तो ध्यान रखने लगा और साथ ही साथ सबको भी गाँव में यह बताने लगा कि, "हमें ऐसा नहीं करना चाहिए और बड़ों की बात को मारना चाहिए।" सबने कहा, "देर आए, दुरुस्त आए।"
#संस्कार_सन्देश -
पुरानी लोक कहावतें यथार्थ और सत्य से जुड़ी होती हैं, इनमें स्वास्थ्य के लिए बड़ी सीख होती हे।
कहानीकार-
#अंजनी_अग्रवाल (स०अ०)
उच्च प्राथमिक विद्यालय सेमरुआ,
सरसौल, कानपुर नगर
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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