149/2026, बाल कहानी- 29 अगस्त
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 149/2026
*29 अगस्त 2026 (शनिवार)*
#बाल_कहानी- #संगम_स्नान_का_पुण्य
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चारों ओर चीख-पुकार मची हुई थी। भागने के लिए कोई मार्ग न था। एक औरत जोर-जोर से रोती हुई हाथ जोड़कर बिलख रही थी-, "मेरी बेटी को बचा लीजिए...मेरी बेटी को मचा लीजिए..कोई तो मदद कीजिए?" वह औरत बिलखती, चिल्लाती रही। लोग गुजरते रहे। उसी समय एक व्यक्ति एक दुकान के पास से धक्का खाकर नीचे गिर पड़ा, वह एक पाँच-सात वर्षाय बालक के लिए था। गिरते समय यदि वह सन्तुलन न बनाता तो धरती में गिरने से बच्चे का सिर फट जाता। वह तुरन्त बच्चे सहित उठा और एक ओर हो गया। किन्तु उस बिलखती और मदद माँगती औरत की किसी ने न सुनी। उसकी बेटी को लोगों ने पैरों तले रौंद दिया। मैं यह देखकर सोच रहा था कि लोगों ने इस औरत की बच्ची को नहीं रौंदा, बल्कि अपने घर-परिवार की इज्जत को रौंदकर उसे मिट्टी में मिला दिया है। यहाँ उस बच्ची के साथ सैंकड़ो लोग कुचले गये। चारों ओर उनका सामान बैग, खाना, खिलौने, बोतलें, कपड़े, पर्स, गहने, चूड़ी और बिन्दी बिखरे पड़े थे। लोग दर्द से कराह रहे थे। चारों ओर भगदड़ मची थी। कोई किसी की सुनने वाला नहीं था। करीब पन्द्रह-बीस मिनट में अनेक एंबुलेंसें आयीं और घायलों को पास के अस्पताल ले जाया गया। सैंकड़ों लोग एक-दूसरे से बिछुड़ गये थे, उनमें उनके बच्चे, बूढ़े, पति-पत्नी, रिश्तेदार और गाँव वाले भी थे। जो बचे थे, वह अपनों को पागलों की तरह दौड़कर ढूँढ रहे थे। कितने बचे, कितने घायल हुए, कितने खो गये? कोई पता नहीं था।
समय गुजरा। सन्तों और साधु- महात्माओं ने अपना स्नान रद्द कर दिया। लोगों को स्नान करने का समय पहले दिया गया। संगम के चारों ओर बाहर से आने वालों के लिए रोक लगा दी गयी। लोगों को स्नान करके तुरन्त घर लौटने को कहा गया। तीन-चार दिनों तक यही चलता रहा। जब भीड़ कम हुई, तब जत्थे के रूप में लोगों को निकाला जाने लगा। लोगों ने अपने-अपने घरों से जब यह सब देखा और सुना तो सभी ने अपना जाना रद्द कर दिया।
अभी भी लोगों को अपनों का इन्तजार है। पता नहीं वे घायल हैं या नहीं हैं या खो गये हैं। अनेक लोग अपने अंगों को तुड़वाकर जब घर वापस आये तो लोगों की आँखें आश्चर्य से भर गयी।
"आखिर ये सब क्यों हुआ, क्यों?" लोग कहने लगे।
"इस सब घटनाओं का कारण हमारे देश के महान ज्योतिषी हैं, जिन्होंने लोगों को बताया कि ऐसा कुंभ प्रयागराज में एक सौ चवालीस साल बाद आया है। इसका बहुत अधिक महत्व है। ऐसे पुण्य पर्व पर संगम में स्नान करने के लिए चूकना नहीं चाहिए। इस पर्व का लाभ व्यक्ति अपने जीवन में एक बार ही ले सकेगा। इसका दूसरा लाभ ये है कि यहाँ विश्व के कोने-कोने से योगी, सिद्ध, तपस्वी, ऋषि-मुनियों के साथ-साथ देवता भी मानव रुप धारण कर आते हैं। उनका एक मात्र दर्शन ही संगम-स्नान से बढ़कर है।" लोग मेरी बातों को ध्यान से सुन रहे थे, कुछ आँसू बहा रहे थे तो कुछ क्रोधित होकर उन ज्योतिषियों और सन्तों को कोस रहे थे, जिन्होंने लोगों में ऐसी धारणा और संगम जाने का लालच भर दिया था। मैं सबके चेहरों पर आते-जाते भावों को पढ़ रहा था और सोच रहा था कि ये कैसा संगम स्नान है, जहाँ लोग एक-दूसरे की मदद करने की वजाय एक-दूसरे को कुचलने और रौंदने तक में भी नहीं हिचकिचाते? ऐसे लोग क्या संगम स्नान का पुण्य पाने के पात्र हैं? सच तो यही है कि माता-पिता, ईश्वर और धरती-आकाश से भी बड़े हैं। उनकी सेवा और आज्ञापालन में ही जीवन का परम अभ्युदय का मार्ग और पुण्य छिपा है। मैंने देखा था कि एक पैंतालीस साल की महिला अपनी बहत्तर वर्षीय सास को लेकर मुस्कराती हुई चौदह किलोमीटर चलकर संगम तट की ओर आ रही थी, लगता था, जैसे- संगम इन्हें खींच रहा हो। ऐसे लोगों के स्नान करने से संगम की तीनों धारायें भी धन्य और पवित्र हो जायेंगी, जो पापियों का वोझ सँभालते-सँभालते कृश और अपवित्र हो गयी होंगी। रामहिं केवल प्रेम प्यारा। जान लेय जो जाननिहारा।। निर्मल जन सो मोहि अति पावा। मोहि कपट, छल-छिद्र न भावा।।
इससे स्पष्ट है कि भाव, विचार, वाणी और आचरण की पवित्रता कितनी जरुरी है, स्वयं के लिए, ईश्वर के लिए, संसार के हित के लिए और अपनी और सबकी उन्नति के लिए। गीता, उपनिषद, वेद, रामायण, भागवत, महाभारत और समस्त पुराण सहित धर्म ग्रन्थ, चाहे वह किसी भी धर्म के हों, केवल इसी ओर इशारा करते हैं। ऋषि-मुनियों के वचन और धर्म-उपदेश हमें इसी ओर ले जाते हैं कि हम सभी में एक ही ईश्वर विविध रुप में समाया हुआ है। अत: हमें सबको अपना मानना चाहिए और सबसे मिलकर एक-दूसरे का सहयोग करते रहना चाहिए, यही हमारा परम निर्मल कर्तव्य और कर्म भी है। इसी में सभी का हित है। समाज, राष्ट्र और देश की उन्नति के मूल में यही तथ्य अब तक काम करता आया है और करेगा। संगम की घटना के बाद जो व्यवस्थायें और नियम आने-जाने के, बाद में निर्धारित कर उन्हें कठोरता से करुणावश अपनाया गया, यदि वैसा पहले शुरु से ही किया जाता तो शायद ऐसा कभी न होता और कहीं पर भी न होगा। आक्षेप सब एक-दूसरे पर लगाते हैं, लेकिन मानवता और सद्भाव तथा सद्गुणों का फर्ज कोई नहीं निभाता है, कुछ को छोड़कर। सच्ची मानवता और कर्तव्य पालन और परम धर्म इसी में है कि हम बड़ों-बूढ़ों, अपने माता-पिता, पति/पत्नी, पुत्रों/पुत्रियों, रिश्तेदारों, मित्रों, पुरा-पडोस वालों और स्टाफ का सम्मान करें, इस प्रकार जो जहाँ है, वह वहीं से कर्तव्य-कर्म करके सच्चा पुण्य लाभ ले सकता है। अयोध्या, काशी, गया, सूकर क्षेत्र, चित्रकूट, मथुरा-वृन्दावन तो सिर्फ हमारी भावनाओं को पवित्र बनाने के निमित्त हैं, ताकि हम अपने अन्दर के दुर्गुणों को निकालकर झुलसाती हुई लपट और गर्मी में सद्भाव और सद्गुणों की छाया में मन-तन और आत्मा को शीतलता प्रदान कर सकें। यही सच्चे प्रेम, आनन्द और उन्नति को पाने का मार्ग है, जो हमारा सर्वांगीण विकास करने में पूर्णतया सक्षम है।" लोग जा चुके थे। मैं भी धीरे-धीरे अपने कदमों को बढ़ाकर अपने घर की ओर लौट रहा था।
#संस्कार_सन्देश -
हमें ऐसे साधु-सन्तों और ज्योतिषियों की बातों में नहीं आना चाहिए कि पुण्य पाने की जगह प्राण गँवाने पड़ें।
कहानीकार-
#जुगल_किशोर_त्रिपाठी
प्रा० वि० बम्हौरी (कम्पोजिट)
मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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