134/2026, बाल कहानी- 8 अगस्त
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 134/2026
*08 अगस्त 2026 (शनिवार)*
#बाल_कहानी - #चेतना
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राजू और मुनिया आज स्कूल से वापस लौटने लगे तो मुनिया के मन-मस्तिष्क में टीचर की एक ही बात गूँज रही थी, "बहुत सारे लोगों ने पेड़ से सेब को नीचे गिरते देखा लेकिन वह छोटी-सी घटना एक महान सत्य अपने भीतर छुपाए हुए थी। यह केवल आइजक न्यूटन ही उद्घाटित कर सके और सदी के महान वैज्ञानिक बन गए।" टीचर ने आगे भी बताया कि, "हमारे दैनिक जीवन में बहुत कुछ महत्वपूर्ण होता है। बहुत कुछ महत्वपूर्ण बन सकता है, पर इस ओर शायद ही किसी की वैज्ञानिक दृष्टि जाती हो, जिससे भविष्य में वैज्ञानिक सोच का निर्माण हो सके।"
ऐसे ही दोनों अपनी-अपनी धुन में घर लौट रहे थे। स्कूल से घर के मध्य एक चाय की दुकान थी, जहाँ जाड़ों में केसरिया दूध और गर्मियों में लस्सी मिलती थी। बगल में एक किराने की दुकान थी, जहाँ पैकेट वाला दूध, चाय और रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजें मिलती थीं। कुछ दूरी पर कुछ घर बने हुए थे और वहीं पंचायत ऑफिस के पास में थोड़ी-सी खाली जमीन इन सबका आपस में ताना-बाना था। किराने की दुकान का बहुत-सा सामान चाय की दुकान और आस-पास के घरों में जाता था और चाय-दूध-लस्सी पंचायत ऑफिस, आस-पास के घरों और किराने की दुकान पर बैठने वालों के पास।
गाँव के उस हिस्से से लगभग लगभग सभी लोग गुजरते थे, पर उनकी चेतना में उस स्थान की सम्भावना न आ पाती। राजू और मुनिया भी छुट्टी के दिनों को छोड़कर रोज ही वहाँ से गुजरते। सबको दिखता कि वहाँ की खाली जमीन किस प्रकार चाय, दूध, लस्सी के कुल्हड़ों से भर रही है। दूध, नमकीन के खाली पैकेट भी वहाँ पड़े रहते। कभी-कभी कोई खीजकर कहता, "यहाँ की सफाई होनी चाहिए, नहीं तो चलना मुहाल हो जाएगा।" आज मुनिया थोड़ा अधिक सचेत होकर अपने आस-पास देख रही थी। होते-करते घर आ गया। फिर वही दादी का प्यार, घर का भोजन, गृह कार्य, विश्राम! जीवन इसी में सिमट गया था। रात होते ही दोनों दादी को दिन-भर का कच्चा-चिट्ठा बताने लगे। मुनिया ने टीचर की बात भी दादी को बतायी कि किस प्रकार लोग आपदा में भी अवसर निकाल लेते हैं। मुनिया रास्ते के कूड़े के बारे में भी दादी को बता रही थी। दादी भी उधर से आती-जाती थी। अचानक उनकी आँखों में चमक आ गई। उन्होंने उत्साह से भरकर मुनिया से कहा, "मुनिया! मुख्यतः वह कूड़ा कुल्हड़ों, खाली पैकेटों का ही तो होता है ना?"
"हाँ, नानी!" कहते-कहते मुनिया की आँखों में भी चमक आ गई। मुनिया को पता चल गया कि नानी क्या कहना चाहती हैं? नानी को पता चल गया कि मुनिया क्या करना चाहती है?
अगला दिन छुट्टी का था। नानी मुनिया, राजू और राजू के दोस्त व अन्य ग्रामीण उस स्थान की ओर चल पड़े। देखते ही देखते सबने कुल्हड़ों, चाय पत्ती, दूध के खाली पैकेटों और नमकीन के पैकेटों को चुनकर उनमें मिट्टी भर स्थानीय पौधे लगा दिए। कुछ में बीज बो दिए गए, कुछ ही घण्टे के श्रम से कूड़ा प्लांटर्स में बदल गया। पंचायत की सहायता से वहाँ दो ड्रम रखे गए, जिसमें एक में कुल्हड़ तथा दूसरे में खाली पैकेट डाले जाने लगे, जिनका भविष्य में प्लांटर्स के रूप में उपयोग हो सके। खाली जमीन जो गन्दगी से भर रही थी, आज हरी भरी लग रही थी। प्लांटर्स के नन्हे-नन्हे पौधे आने-जाने वालों को मुस्कुराने पर विवश कर रहे थे।
#संस्कार_सन्देश -
उस हर वस्तु को रिसाइकल करने का प्रयास करो, जो कूड़ा समझी जाती है।
कहानीकार-
डॉ #सीमा_द्विवेदी (स०अ०)
कम्पोजिट विद्यालय कमरौली
जगदीशपुर, अमेठी (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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