क्यों लड़ता हूँ जिन्दगी तुझसे
क्यों लड़ता हूँ जिन्दगी तुझसे?
तुझे अपना समझकर
क्यों बतियाता हूँ जिन्दगी तुझसे?
खुद खामोश रहकर
तुझपे नियति का कब्जा है
तुझपे समय का जाल है
तू प्रकृति के खूँटे से बँधी
तू जज्बातों का जंजाल है
क्यों सँवारता हूँ जिन्दगी तुझे?
मैं खुद को बिखेरकर
क्यों निहारता हूँ जिन्दगी तुझे?
मैं खुद को खोकर
मैं जाना कहीं जाना चाहता हूँ
तू कहीं ओर ले जाती है।
मैं कुछ और पाना चाहता हूँ
तू कुछ और दे जाती है।।
क्यों समझाता हूँ जिन्दगी तुझे?
मैं खुद उलझकर
क्यों बहलाता हूँ जिन्दगी तुझे?
मैं खुद बहककर
जी रहा हूँ तुझको एक हसीं
सपना समझकर
गले लगा ले जिन्दगी तू मुझे भी
अपना समझकर
रचयिता
रमेश चंद्र जोशी(सत्यम जोशी),
सहायक अध्यापक,
रा0 प्रा0 वि0 बैकोट,
विकास खण्ड - धारचूला,
जनपद - पिथौरागढ़,
उत्तराखण्ड।

बहुत सुंदर👌👌👌💐
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