ये दौर है कैसा

ये कैसा शहर है ये दौर है कैसा
जहाँ हर शख्स कभी दिखता है अपना
और कभी महज़ एक सपना
कभी हँसता मुस्कुराता
कभी गम से भरमाया
खोया हुआ बस अपने में ही।

जहाँ भी जाइए मिलते हैं बस सवाल
हर किसी का एक सा ही है हाल
हर कोई जैसे सुनाना चाहता है कोई दास्ताँ
जो दफन है उसके सीने में बरसों से
न कर पाया पर जिसे बयां।

सच बड़ा अजीब सा लगता है सब कुछ कभी-कभी
मगर फिर भी एक अनोखा सा अपनापन है इस पूरे माहौल से

कभी-कभी सोचती हूँ
आखिर क्यों है ये अपनापन, ये जुड़ाव
आखिर कौन सी है वो कड़ी जो जोड़े है हम सबको
फिर लगता है कि ये ही अनकही दास्ताँ
यही अनबूझे सवाल
हाँ ये ही तो हैं जिन्होंने बाँध दिए हम सब दिल के तार।

क्योंकि असल में हर इंसान को नज़र आता है अपना ही अक्स
हर दूसरे इंसान में
शायद इसीलिए ये अपनापन है
हम सभी में
शायद इसीलिए ये अपनापन है
हम सभी में।

रचयिता 
रचना गुप्ता,
सहायक अध्यापिका,
राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय मुकर्रबपुर,
विकास खण्ड-रुड़की, 
जनपद-हरिद्वार,
उत्तराखण्ड।

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