एक अनोखी परंपरा- नन्दा देवी राजजात यात्रा

सांस्कृतिक व धार्मिक मान्यताओं से परिपूर्ण देवभूमि उत्तराखंड में अनेकानेक पौराणिक मान्यताएँ मानव को मानवता और प्रकृति से जोड़ती सी प्रतीत होती हैं। उन मान्यताओं में से एक एशिया की सबसे लंबी पैदल यात्रा और गढ़वाल-कुमाऊँ की सांस्कृतिक विरासत श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा अपने में कई रहस्य और रोमांच को संजोए हुए एक अनोखी यात्रा है। 7वीं शताब्दी में गढ़वाल के राजा शालिपाल ने राजधानी चांदपुर गढ़ी से देवी श्रीनंदा को 12वें वर्ष में मायके से कैलाश भेजे जाने की इस परंपरा को शुरू किया था।
तत्पश्चात राजा कनकपाल ने इस धार्मिक यात्रा को भव्य रूप दिया। इस परंपरा का निर्वहन 12 वर्ष या उससे अधिक समय के अंतराल में गढ़वाल के राजा के प्रतिनिधी कांसुवा गाँव के राज कुँवर, नौटी गाँव के राजगुरु नौटियाल ब्राह्मण सहित 12 थोकी ब्राह्मण और चौदह सयानों (अनुभवी बुजुर्गों) के सहयोग से होता है।
चमोली जिले में पट्टी चाँदपुर और श्रीगुरु क्षेत्र को माँ नंदा का मायका और बधाण क्षेत्र (नंदाक क्षेत्र) को उनकी ससुराल माना जाता है।

चौसिंगा खाडू (चार सींग वाली भेड़) श्रीनंदा राजजात की अगुवाई करता है। मनौती के बाद पैदा हुए इस चौसिंगा खाडू को ही यात्रा में अनिवार्यतः शामिल किया जाता है। इस प्रकार की अनेकानेक चीजें इस यात्रा से जुड़ी हुई हैं। दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में प्रत्येक बारह साल में आयोजित होने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा तो बहुत प्रसिद्ध है परंतु कम लोग यह जानते हैं कि यह धार्मिक यात्रा हर वर्ष विधि- विधिविधान से आयोजित की जाती है। हर वर्ष आयोजित होने वाली नंदा की विदाई का यह लोक उत्सव नंदादेवी लोकजात के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है।

राजजात के वर्ष यानी प्रत्येक बारह वर्ष में बधाण की माँ नन्दा की डोली ही सम्पूर्ण जात की अगवानी करती है बधाण की नंदा देवी का जनपद चमोली के एक बड़े क्षेत्र में अपना प्रमुख स्थान है। प्रत्येक वर्ष यह लोकजात यात्रा "बधाण की उत्सव डोली" जनपद चमोली में विकासखण्ड घाट के सिद्धपीठ कुरुड़ धाम से  देवाल विकासखण्ड के वेदनी बुग्याल में स्थित वेदनी कुण्ड में पूजा-अर्चना के पश्चात वापस देवराड़ा आती है और छः माह देवराड़ा में ही रहती है उसके बाद पुनः कुरुड़ रवाना होती है। बधाण की माँ नन्दा देवी का मायका कुरुड़ क्षेत्र व देवराड़ा जिसे बधाण क्षेत्र भी कहा जाता है, उनका ससुराल माना जाता है।
लोकजात यात्रा का आयोजन नंदा देवी लोकजात समिति कुरुड़ द्वारा किया जाता है। यात्रा का शुभारम्भ जन्माष्टमी के दिन से आयोजित होने वाले दो दिवसीय कुरुड़ मेले से होता है। मेले के समापन के साथ ही देव डोलियाँ कैलाश के लिए रवाना होती हैं। इसमें कुरुड़ की नन्दा डोली कुरुड़ से विभिन्न पड़ावों से होते हुए रामणी गाँव के बुग्याल बालप में सम्पन्न होती है और वापस कुरुड़ लौट जाती है। बधाण की माँ नन्दा लोकजात का आयोजन कुरुड़ लोकजात समिति द्वारा ही किया जाता है। इस यात्रा का समापन वेदनी में दो दिवसीय भव्य रूपकुण्ड महोत्सव के साथ होता है।

इस वर्ष यह यात्रा कोरोना के चलते सूक्ष्म रूप में आयोजित होगी। जिला प्रशासन द्वारा नियमानुसार सीमित संख्या लोगों को प्रतिभाग की अनुमति दी है।
माना जाता है कि माता पार्वती के सती होने के उपरांत हिमालय क्षेत्र के राजा हेमंत और उसकी पत्नी मैनावती के घर नंदा के रूप में सती का पुनर्जन्म हुआ। इनकी बाल्यावस्था से ही शिव भक्ति में आसक्ति रहती थी और इसी कारण नंदा अन्न त्याग कर, पत्ते खाकर जीवन यापन करने लगी। यही कारण था कि नंदा को 'पाखंडेश्वरी' नाम से पुकारा जाने लगा। आगे चलकर नंदा ने अन्न जल त्याग दिया और उनका नाम 'अप्णा' भी कहा गया। कालानंतर में नंदा अष्टमी के दिन नंदा का विवाह शिव के साथ हुआ। शुरूआत में नंदा कैलाश के वातावरण में आनंदित रही। लेकिन धीरे-धीरे उसे मायके की याद सताने लगी। 12 वर्षों तक नंदा के मायके वालों ने उसे कोई निमंत्रण नहीं भेजा। जिस कारण नंदा नाराज हुई। के रूप होने से हेमंत के राज्य में अकाल और विद्रोह जैसे संकट पैदा होने लगे। तब हिमालय राज को अपनी पुत्री नंदा की याद आई और उन्होंने नंदा को मायके बुलाया नंदा के मायके आने पर राज्य में सब सामान्य हो गया। नंदा कुछ समय तक मायके रही। फिर वापस अपने ससुराल कैलाश धाम आ गई। तब से निरंतर नंदा के कैलाश जाने पर यह यात्रा आयोजित की जाती है। नंदा को हिमालयी लोग अपनी ध्याण यानी बहन मानते हैं। पहाड़ में आज भी रिवाज है कि जब बेटी अपनी सुसराल जाती है तो मायके वाले उसे हंसी-खुशी ससुराल पहुंचाते हैं।
अटूट आस्था और श्रद्धा की प्रतीक इस यात्रा से सम्बंधित इस प्रकार की अनेकों अनोखी रोमांचक कहानियाँ और लोक कथाएँ प्रचलित हैं। इन कहानियों ने पीढ़ी दर पीढ़ी दशकों का सफर तय किया और ये आज भी उतनी ही जीवंत हैं और श्रद्धा के साथ सुनी सुनाई जाती हैं। यह लोक यात्रा हमारे समाज में स्त्रियों को दिए जाने वाले उस सम्मान की द्योतक है जो बेटी को विदा करके भी उसे स्वयं से जुदा नहीं मानती। देश परदेश से सभी लोग घर पहुँचकर बहन नंदा को विदा करने पहुँचते हैं।अनेकों घटनाएँ व कहानियाँ समेटे हुए गीत गाते हुए नंदा को विभिन्न प्रकार के उपहारों व धनधान्य की भेंट के साथ कैलाश की ओर उनकी अश्रुपूर्ण विदाई दी जाती है। पुनः एक बार फिर लौट के आने की आस के साथ।

रचयिता
पूनम दानू पुंडीर,
सहायक अध्यापक,
रा०प्रा०वि० गुडम स्टेट,
संकुल-तलवाड़ी,
विकास खण्ड-थराली,
जनपद-चमोली, 
उत्तराखण्ड।

Comments

  1. बहुत ही सुंदर जानकारी
    Very nice mam

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    1. हार्दिक धन्यवाद🙏🙏🙏

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