खेल

बहुत हो चुका पढ़ना लिखना,
अब तो हम खेलेंगे खेल।
पापा तुमको समझाऊँ कैसे,
बहुत जरूरी होते हैं खेल।

मांसपेशियाँ मजबूत बनाकर,
शरीर को स्वस्थ बनाते खेल।
निर्बल निढाल तन मन में,
चुस्ती फुर्ती लाते खेल।

तन मन में जिसके खेल समाये,
किस्मत उनकी चमकाते खेल।
देश के कितने बेटे बेटी ने,
लक्ष्य बनाया अपना खेल।

ध्यानचंद, कपिल, सचिन के,
दिल दिमाग में था बस खेल।
खेल जगत में सम्मान दिलाए,
सबको पहचान दिलाए खेल।

कुश्ती, तैराकी, तीरंदाजी,
जो मन भाए खेलो खेल।
महत्व खेल के समझो भाई,
खेलों का है ना कोई मेल।

घर के अंदर और बाहर ,
खॆले जाते हैं दोनों खेल।
क्रिकेट, कबड्डी, खो खो  खेलो,
या खेलो तुम रेलम रेल।

घर के अंदर लूडो खेलो,
या खेलो शतरंज के खेल।
बच्चे बूढ़े सब मिल खेलें,
कई तरह के प्यारे खेल।

भारत  माँ की बेटियों ने,
खेलों में परचम लहराया।
खेल जगत में भारत माँ को,
सितारे सा चमकाया।

सभी से है बस यही गुजारिश,
पंछी को गगन में उड़ने दो।
मत पिंजरे में उनको कैद करो,
उन्हें खुद पर भरोसा करने दो।

जीवन भी एक खेल है प्यारे,
मत करो नादानी अब,
क्या पता कब हो जाएँ आउट,
थोड़ी कर लें शैतानी अब।

रचनाकार
सपना,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय उजीतीपुर,
विकास खण्ड-भाग्यनगर,
जनपद-औरैया।

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