बन्धनों से ऊपर उठ जाएँ

बन्धनों से ऊपर उठ जाएँ,

बन्धनों से ऊपर उठ जाएँ,
इसलिए धरा पर आये हैं।
गये थे क्या लेकर यहाँ से?
जो आज यहाँ पर लाये हैं।

   सभी बात करते आपसे यही,
   जो सदियों पुरानी लगती है।
    उलझे रहते हैं जाति-धर्म में,
    क्या समता का दीप जलाये हैं?
बन्धनों से ऊपर उठ जाएँ।
इसलिए धरा पर आये हैं।।

    अपने लिए तो सब जीते हैं,
     औरों के काम कब आये हैं?
      मानव धर्म है सबसे ऊपर,
      क्या परहित-पथ अपनाये हैं?

श्रेष्ठ कृति हैं आप प्रकृति का,
प्रेम-पथिक बनकर दिखाये हैं।
पूर्ण भुवन है आश्रित आप पर,
दिलों में ऐसा हम भाव जगाये हैं।।
       बन्धनों से ऊपर उठ जाएँ।
        इसलिए धरा पर आये हैं।।

रचयिता
रवीन्द्र शर्मा,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय बसवार,
विकास क्षेत्र-परतावल,
जनपद-महराजगंज,उ०प्र०।

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