गुरु पूर्णिमा
मैं कागज का फूल जो ठहरा,
तूने गुण सुगंध की दी।
मैं तो उलझा रहा भंवर में,
तूने ज्योति पुंज दे दी।।
मलिन हृदय से तम हर कर,
गरिमा का संचार किया।
अपने अमोघ गुरु ज्ञान से गुरु,
तूने हमें नव पहचान दिया।।
आशीष, स्नेह, ममता देकर,
आह्लाद दिया गुरुवर तूने।
जो आज, अभी कुछ बन पाया,
सींचा हमको ही तो तूने।।
हे! पूज्य परम, हे! सर्वश्रेष्ठ,
हे! अति महान, हे! विमल वेश।
सादर नमन, हे! व्यक्ति विशेष,
हुए धन्य मिला, जो परम तेज।।
रचयिता
अरविन्द कुमार सिंह,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय धवकलगंज,
विकास खण्ड-बड़ागाँव,
जनपद-वाराणसी।

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