कारगिल विजय दिवस

अपने रक्तवर्ण चन्दन से अभिनन्दन करने आया हूँ।    

प्राणों की आहुति से माँ का वन्दन करने आया हूँ।।

माँ भी छोड़ी, पिता भी छोड़ा, भैया को भी छोड़ा है।

भारत माँ की खातिर जिसने बहनों से मुँह मोड़ा है।।

पत्नी छोड़ी, बच्चे छोड़े, घर-परिवार भी छोड़ा है।

सेज सुख की छोड़ गया वह देशभक्ति की प्रेरणा है।।

जब वो सैनिक सरहद से अपने घर वापस आता है।।

या तिरंगा में लिपटा होता या तिरंगा लहराता है।।

उस सैनिक की अर्थी पर नभ पुष्प वर्षा करता है।

हिमालय भी उस अर्थी को काँधा देने झुक जाता है।।

जन-जन की आँखों का आँसू आज समन्दर लगता है।

ऐसा जन इस जगती तल पर सदा अमर हो जाता है।।

मेरी एक बाँह टूटी है भैया ने ये सोचा है।

बिन भैया में कैसे जीऊँ जीवन लगता खोटा है।।

देख के अर्थी भैया की बहिनों के आशा टूटी है।

रक्षाबंधन के दिन देखो राखी कैसी रूठी है।।

पुत्र वियोग में भी पिता ने कैसा रुदन मचाया है।

देख के अर्थी बेटे की, माँ का आँचल हरियाआ है।।

माथे की बिंदिया उजड़ी, सिंदूर माँग का उजड़ा है।

हाथों की मेंहदी उजड़ी, पैरों का महावर उजड़ा है।।

सूरज लालिमा बिखेर रहा पर चारों तरफ अँधियारा है।

जब मेंहदी वाले हाथों ने मंगलसूत्र  उतारा है।।

अपने कोमल उर को  जिसने आज पत्थर कर रखा है।

जीवनसाथी की अर्थी को जिसने काँधा दे रखा है।।

ऐसी वीरांगना के चरणों में मेरा मनमस्तक झुकता है।

बार-बार उसकी कोख से जन्मूँ मन मेरा करता है।।

जब कोई सैनिक देशभक्ति की वेदी पर चढ़ जाता है।

स्वर्ण अक्षरों में अपना नाम अमर कर जाता है।।

तुम्हारे प्राणों की आहुति पर नतमस्तक हो जायेंगे।

युग-युग तक ये दुनिया वाले श्रद्धासुमन चढ़ायेंगे।।

मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में एक ही गीत गुनगुनायेंगे।

शहीदों की चिताओं पर हर वर्ष मेले लगायेंगे।।


रचयिता

अजय विक्रम सिंह, 
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मरहैया,
विकास क्षेत्र-जैथरा,
जनपद-एटा।

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