विश्व जनसंख्या दिवस

जनसंख्या का भार बढ़ा जो,

पृथ्वी थर-थर काँप रही।

नभ-जल-थल सब हुए प्रदूषित, 

व्याकुलता अभिशाप हुई।।


कटते वन हरियाली नोचें,

फैक्ट्रियाँ वायु रफ्तार।

बढ़ता वैमनस्य धरती पर,

करता है वैश्विक संहार।।


जीव-जगत में उथल-पुथल है,

प्रकृति भी विकराल हुई।

नभ-जल-थल.............


मानव जन यदि समझ सके तो,

हो बुराइयों का सब अंत।

प्रकृति का दोहन कम कर दे तो,

सदा रहे नित खिला वसंत।।


बढ़ती जनसंख्या से सबकी,

सुख-समृद्धि की हानि हुई।

नभ-जल-थल................


रचयिता

अरविन्द कुमार सिंह,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय धवकलगंज, 
विकास खण्ड-बड़ागाँव,
जनपद-वाराणसी।



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