उत्तरायणी त्योहार
उत्तरायणी त्योहार है आया,
शुभ कार्यों को साथ में लाया।।
षटमासिक दक्षिणायन के पश्चात,
उत्तरायणी शुभ पर्व है आया।
छमाही है चक्र बनाया,
सूर्यदेव भी है हर्षाया।।
धनु छोड़ सूर्य मकर में आया,
संग खुशियाँ सौगात है लाया।
नए कार्य, मुंडन, शुभ-विवाह,
गृहप्रवेश आदि भी करवाया।
गंगा धरती पर उतरी थी,
समुद्र में जाकर मिल गयी थी।
देवताओं का ये दिन कहलाया,
जन-मानस की उम्मीद है लाया।
तिलसक्रांति, पोंगल, बीहू, लोहड़ी,
कई नामों इसको जाना जाता है।
खीर, खिचड़ी, तिलगुड़, मूँगफली,
हर कोई खाता और खिलाता है।
ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान,
शुभ माना जाता है।
दानपुण्य करके मनुष्यों के,
पूर्वजों को तारा जाता है।।
दिन बड़े और रातें छोटी,
अब से हो जाता है।
सकारात्मक ऊर्जा है भरपूर,
यह है सच... माना जाता है।
मिलजुल कर खुशियाँ मनाते,
रंग-बिरंगी पतंग उड़ाते।
फसलों का त्योहार मनाते,
ढोल-नगाड़े खूब बजाते।
उत्तरायणी त्योहार है आया,
शुभ कार्यों को साथ में लाया।।
रचयिता
बबली सेंजवाल,
प्रधानाध्यापिका,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय गैरसैंण,
विकास खण्ड-गैरसैंण
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

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