विश्व हिन्दी दिवस

विश्व हिन्दी दिवस पर हो,

कुछ सृजन की साधना।

आइये! मिलकर करें हम,

सार्थक परिकल्पना।।


बढ़ रही हर ओर हिन्दी 

की प्रगति,

दिख रही नूतन सुखद 

सम्भावना।


आज सीमा तोड़ करके

बह रही रस धार है,

क्षेत्र तक सीमित नहीं,

अब शब्द का व्यापार है।।


अब क्षितिज के पार से भी

झाँकती है अल्पना,

आइये मिलकर करें हम

सार्थक परिकल्पना।


द्वार खुलते जा रहे                 

 सम्भवनाओं के,

पन्थ मिलते जा रहे

सद्भावनाओं के।


प्रेम से परिपूर्ण हो अब

लोक मानस भावना,

आइये! मिलकर करें हम

सार्थक परिकल्पना।


रचयिता
डॉ0 प्रवीणा दीक्षित,
हिन्दी शिक्षिका,
के.जी.बी.वी. नगर क्षेत्र,
जनपद-कासगंज।


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