हे मानवता! तू गयी कहाँ?

भावनाहीन लोग सब ओर यहाँ
हे मानवता! तू गयी कहाँ?

करके दफ़न गर्भ में पुत्री,
पुत्र संसार मे लाना है,
घोंटकर गला माँ की ममता का,
कुल का गौरव बढ़ाना है,
क्यों पुत्री है बोझ यहाँ.......
हे मानवता! तू गयी कहाँ?

प्यार, अपनापन, भाई-चारा...
ये फैशन अब पुराना है,
क्यों जाएँ सुख-दुख मे मिलने,
सोशल मीडिया का ज़माना है,
द्वेष-भाव घनघोर यहाँ.....
हे मानवता! तू गयी कहाँ?

न प्यासे को पानी देना है,
न भूखे को भोजन कराना है,
दया-भाव से रिक्त हृदय है,
बस स्वयं के लिए कमाना है,
दयाहीनता का ज़ोर यहाँ.....
हे मानवता! तू गयी कहाँ?

हिंसा, दानवता के शोर मे,
मार्मिक चीत्कारों को दबाना है,
भूलकर मानव के धर्मों को,
अपनों का रक्त बहाना है,
क्यों  भयावह हुआ ये जहां....
हे मानवता! तू गयी कहाँ?

रचयिता
दीप्ति खुराना,
सहायक अध्यापक, 
जूनियर कम्पोजिट विद्यालय पंडिया,
विकास खण्ड-कुन्दरकी, 
जनपद-मुरादाबाद।

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