मम्मी पापा अब तो बहुत डर लगता है
मम्मी पापा अब तो बहुत डर लगता है,
सब जगह वही दरिंदा नज़र आता है।
मैं तो यह जग छोड़कर चली,
मैं थी आपकी प्यारी बिटिया लाडली।
घर से निकली थी हो अनजान,
नहीं मालूम था कि राह में खड़े हैं हैवान।
डर नहीं लगता जंगली जानवरों से,
जितना डर लगने लगा इन दरिंदों से।
कोख में ही मम्मी मुझे मार देना,
इन दरिंदों की दरिंदगी नहीं मुझे सहना।
पापा आपसे भी कुछ है कहना,
अगर आ जाऊँ इस दुनिया में तो मुझे इन दरिंदों से छिपाना।
भईया मैं आपकी चंचल प्यारी बहना,
इन दरिंदों से मुझे बचाना, इनकी दरिंदगी नहीं सहना।
आज मैं जली कल कोई और जलेगी,
फिर तो इस धरती पर कोई लड़की नहीं आएगी।
यह मोमबत्ती जलाने का सिलसिला कब रुकेगा,
इन दरिंदों को खत्म करने का कानून कब बनेगा।
जनता मोमबत्ती जलाकर शांत हो जाती है,
कुछ दिन बाद फिर किसी की बेटी-बहन जला दी जाती है।
मम्मी पापा अब तो मरकर भी डर लगने लगा है,
दरिंदगी करने वालों में कभी गैर तो, कभी अपना सगा है।
मम्मी पापा अब तो बहुत डर लगता है,
सब जगह वही दरिंदा नज़र आता है।
रचयिता
शिराज़ अहमद,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय ददरा,
विकास खण्ड-मड़ियाहूं,
जनपद-जौनपुर।
सब जगह वही दरिंदा नज़र आता है।
मैं तो यह जग छोड़कर चली,
मैं थी आपकी प्यारी बिटिया लाडली।
घर से निकली थी हो अनजान,
नहीं मालूम था कि राह में खड़े हैं हैवान।
डर नहीं लगता जंगली जानवरों से,
जितना डर लगने लगा इन दरिंदों से।
कोख में ही मम्मी मुझे मार देना,
इन दरिंदों की दरिंदगी नहीं मुझे सहना।
पापा आपसे भी कुछ है कहना,
अगर आ जाऊँ इस दुनिया में तो मुझे इन दरिंदों से छिपाना।
भईया मैं आपकी चंचल प्यारी बहना,
इन दरिंदों से मुझे बचाना, इनकी दरिंदगी नहीं सहना।
आज मैं जली कल कोई और जलेगी,
फिर तो इस धरती पर कोई लड़की नहीं आएगी।
यह मोमबत्ती जलाने का सिलसिला कब रुकेगा,
इन दरिंदों को खत्म करने का कानून कब बनेगा।
जनता मोमबत्ती जलाकर शांत हो जाती है,
कुछ दिन बाद फिर किसी की बेटी-बहन जला दी जाती है।
मम्मी पापा अब तो मरकर भी डर लगने लगा है,
दरिंदगी करने वालों में कभी गैर तो, कभी अपना सगा है।
मम्मी पापा अब तो बहुत डर लगता है,
सब जगह वही दरिंदा नज़र आता है।
रचयिता
शिराज़ अहमद,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय ददरा,
विकास खण्ड-मड़ियाहूं,
जनपद-जौनपुर।

शानदार
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