ढलते हुए सांझ
लालिमा ही लालिमा छायी है
इस पूरे आकाश में
सांझ होने को आयी है
नीरवता की छाँव में
न जाने कितनी पतंगें हैं
इस सुने आकाश में
कहीं से उठती हवा के झोंके हैं
इस पूरे खलिहान में
मंद मंद मुस्कुराती हैं
पवनों की उच्छवास में
घर को लौटते पक्षी हैं
एक ओर से आसमान में
सांझ हुई सब सूनापन है
वीरानियाँ है आकाश में
तरंगों में बहती ये हवाएँ हैं
रक्त का नया संचार लिए
रचयिता
आराधना कुशवाहा,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मोहरगंज,
विकास खण्ड-चहनियां,
जनपद-चन्दौली।
इस पूरे आकाश में
सांझ होने को आयी है
नीरवता की छाँव में
न जाने कितनी पतंगें हैं
इस सुने आकाश में
कहीं से उठती हवा के झोंके हैं
इस पूरे खलिहान में
मंद मंद मुस्कुराती हैं
पवनों की उच्छवास में
घर को लौटते पक्षी हैं
एक ओर से आसमान में
सांझ हुई सब सूनापन है
वीरानियाँ है आकाश में
तरंगों में बहती ये हवाएँ हैं
रक्त का नया संचार लिए
रचयिता
आराधना कुशवाहा,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मोहरगंज,
विकास खण्ड-चहनियां,
जनपद-चन्दौली।

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