बाल शोध मेला

बच्चों में वैज्ञानिक सोच व समझ विकसित करने के लिए बाल शोध मेले आवश्यक हैं।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के मार्गदर्शी सिद्धांतों के अनुसार बच्चों के लिए सीखने - सिखाने की प्रक्रिया में बाल शोध अहम् भूमिका निभाते हैं। इस प्रक्रिया में छात्रों एवं शिक्षकों के संयुक्त प्रयास से किसी तथ्य, घटना, स्थानीय इतिहास, रहन सहन, परम्परा, संस्कृति, फसलों, जल स्रोतों आदि का क्रमबद्ध अध्ययन कर किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है।
बच्चे इस प्रकिया में कल्पना करते हैं, अनुमान लगाते हैं, स्वयं से अनुभव करते हैं और बड़ों से संवाद करते हुए अपनी समझ को विकसित करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उनके भीतर की जिज्ञासा, कौतूहल, आनन्‍द की अनुभूति व मन में उठ रहे प्रश्न उन्हें कुछ नया खोजने की ओर प्रेरित करते हैं। बच्चों में कल्पना शक्ति जागृत करने, अनुमान लगाने, तर्क करने, चीजों को स्वयं से खोजने, प्रश्न पूछने और स्वयं से अनुभव करने के लिए बाल शोध मेले पूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। वे अपनी स्कूल के परिवेश और गाँव को सीखने के एक स्रोत के रूप में मानते हैं। उन्हें परिवेश से जुड़ने, उनकी जानकारियों को व्यवस्थित करने तथा उसके आधार पर नई बातों को समझने के अवसर मिलते हैं।  

सीखना केवल कक्षा में बच्चों और शिक्षकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए अपितु बच्चों का पूरा परिवेश और उनके आसपास घटित घटनाएँ भी उनकी सहभागी बनती हैं। कक्षा कक्ष से बाहर निकलकर इस प्रक्रिया में बच्चे अनुमान लगाना सीखते हैं, अवलोकन करते हैं, वस्तुओं का वर्गीकरण करते हैं, आँकड़ों को एकत्रित कर विश्लेषण करते हुए तुलनात्मक अध्ययन करते हैं। बच्चे को सीखने का पूर्ण अवसर दिया जाता है। शिक्षक बाल शोध के लिए बच्चों को काम करने के लिए सम्भावित विषय चयन कर दे सकते हैं।

कक्षा तीन से पाँच तक की एवं कक्षा छ:से आठवीं तक की पाठ्यपुस्तक में विभिन्न पाठ, थीम और विषयवस्तु दी गयी हैं। जो बच्चों के परिवेश से जुड़ती हैं। हम कक्षा में तो उन्हें पाठ के तौर पर पढ़ाते ही हैं, यदि उन विषयों को बच्चों के परिवेश से जोड़ते हुए उन्हीं पर कुछ खोजने के लिए कहा जाए तो उनकी पुख्ता समझ बनती है और यहाँ चीजों को याद करने के बजाय समझ विकसित करने का अवसर मिल पाता है।
बाल शोध मेले के लिए सम्भावित विषय निम्न प्रकार से हो सकते हैं-
गाँव का इतिहास, रहन सहन, संस्कृति, वेशभूषा, परम्परा, रीति-रिवाज, काम-धन्धे, पानी के स्रोत, फसल, तीज त्योहार, आर्थिक स्रोत, मेले, घर आदि पर शोध किया जा सकता है।
बाल शोध मेला शोध जैसे विषय को सरलता और सहजता से करने के मौके उपलब्ध कराता है। यह पूरी प्रक्रिया रोचक और आनन्‍ददायी होती है। इसके साथ ही बच्चों में विभिन्न कौशलों और दक्षताओं के विकास हेतु भी यह उपयोगी और सार्थक सिद्ध होता है।

लेखक
माधव सिंह नेगी,
प्रधानाध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय जैली,
विकास खण्ड-जखौली,
जनपद-रुद्रप्रयाग,
उत्तराखण्ड।

Comments

  1. मिशन शिक्षण संवाद उत्तराखण्ड का हार्दिक आभार व धन्यवाद

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  2. बहुत ही सुंदर लेख

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