पलायन
गाँवों की यादें हमें पल -पल शहर में बहुत सताती हैं
मेल भाव का समाज व दिया की बाती जब सपनों में टिमटिमाती है
शहर तो आया कि कुछ मैं भी कमाऊँगा
पर क्या इस भीड़ भाड़ में कुछ सुकून भी पाऊँगा
शहर का ये शोर शराबा मन को भटकाता है हर पल
गाँवों की वो मासूम सी शांति याद आती है हर पल
गाँवों के मेले वो साथ बिताए खुशियों की बातें
ढोल दमाऊं के साथ थिरकते कदम उछलते कूदते बच्चे
रोजगार की मार से खाली होते ये हमारे गाँव
मधु की चाहत में क्यूँ शहर में खोजते हम थोड़ी सी छाँव
कैसे उमस भरी प्रदूषण से जूझती शहर की ये जिंदगी
गाँवों के जीवन से कभी न बेहतर हो सकती ये जिंदगी
सपने जिसके लिए हम छोड़कर आए अपने-अपने गाँव
क्या हमको वो सब कुछ मिला जिसके लिए हमने यहाँ पसारे अपने पाँव
काश हमको भी उस वक्त मिल जाताजि सकी हमें थी चाह
हम भी टिक जाते वहीं पर शहर न होते हमारे सपनों के दाँव
रचयिता
रवि बिष्ट,
प्रधानाध्यापक,
रा0 प्रा0 वि0 थापला वल्ला,
विकास खण्ड-बीरोंखाल,
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।
मेल भाव का समाज व दिया की बाती जब सपनों में टिमटिमाती है
शहर तो आया कि कुछ मैं भी कमाऊँगा
पर क्या इस भीड़ भाड़ में कुछ सुकून भी पाऊँगा
शहर का ये शोर शराबा मन को भटकाता है हर पल
गाँवों की वो मासूम सी शांति याद आती है हर पल
गाँवों के मेले वो साथ बिताए खुशियों की बातें
ढोल दमाऊं के साथ थिरकते कदम उछलते कूदते बच्चे
रोजगार की मार से खाली होते ये हमारे गाँव
मधु की चाहत में क्यूँ शहर में खोजते हम थोड़ी सी छाँव
कैसे उमस भरी प्रदूषण से जूझती शहर की ये जिंदगी
गाँवों के जीवन से कभी न बेहतर हो सकती ये जिंदगी
सपने जिसके लिए हम छोड़कर आए अपने-अपने गाँव
क्या हमको वो सब कुछ मिला जिसके लिए हमने यहाँ पसारे अपने पाँव
काश हमको भी उस वक्त मिल जाताजि सकी हमें थी चाह
हम भी टिक जाते वहीं पर शहर न होते हमारे सपनों के दाँव
रचयिता
रवि बिष्ट,
प्रधानाध्यापक,
रा0 प्रा0 वि0 थापला वल्ला,
विकास खण्ड-बीरोंखाल,
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

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