पिता की महिमा

कभी लगे गर्जन जलधर की,
कभी सुमधुर स्वर निर्झर का।
कभी तो हों आधार धरा सा,
कभी बनें कवच अम्बर सा।।
कभी हो ज्वाला सूर्य सतह की,
कभी तरु की शीतल छाया।
इन्हीं विलक्षण गुणों ने मिलकर,
एक पुरुष को पिता बनाया।
रख नेपथ्य में कोमल मन,
धर रूप कठोर मुद्राओं वाले।
लगे नहीं निर्बल भावुक से,
रौद्र आँखों में ऐसा डालें।।
पीड़ा देकर दोष मुक्त करें,
रोग हरें जो औषध बनकर।
बुझा दें जलती लौ संकट की,
स्वयं चलें वो अग्निपथ पर।।
पिता हैं तो है सुख जीवन में,
सकल मनोरथ पूर्णकर्ता।
अश्रु पीकर हर्ष दें हमको,
पिता ही हैं दुख बाधाहर्ता।।

रचयिता
दीप्ति सक्सेना,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय कटसारी,
विकास खण्ड-आलमपुर जाफराबाद,
जनपद-बरेली।

Comments

  1. Mission shikshan samvaad vicharshakti ka vicharon ke samman hetu bahut bahut dhanywaad... sabhi shikshak saathion ko jo ki ek pita bhi hen pitra divas ki haardik shubhkaamnaen

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