174/2026, बाल कहानी- 03 अक्टूबर
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 174/2026
*03 अक्टूबर 2026 (शनिवार)*
#बाल_कहानी- #जिउतिया_व्रत
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आज राजू और मुनिया के स्कूल में जिउतिया व्रत के कारण महिला अध्यापिकाएँ अवकाश पर थी। छुट्टी के उपरान्त दोनों उछलते-कूदते घर पहुँचे और दादी से व्रत के बारे में पूछताछ करने लगे-, "दादी! आज पता है ना आज हमारे स्कूल में कोई भी मैडम नहीं आई थी। आज केवल सर ने हमें पढ़ाया। वह किसी व्रत की बात कर रहे थे दादी। जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत..।"
दादी ने हँसकर प्यार से राजू और मुनिया को लिपटाते हुए कहा, "बेटा! आज तुम्हारी माँ भी तो तुम्हारे लिए व्रत रखे है और मेरे लिए।" नानी मुनिया उदास होकर बोली, "तब तक राजू की माँ भीतर से खीर लेकर राजू और मुनिया के पास आयी। उन्होंने मुनिया को प्यार करते हुए कहा, "मुनिया! तुम्हारे लिए भी मैंने व्रत रखा है और लो यह खीर खाओ।" बच्चे खीर खाने लगे, तब तक मुनिया ने उत्सुकता से पूछा-, "पर मामी! नानी यह व्रत कैसा होता है?" दादी ने हँसकर कहा, "तो लो इस व्रत की कथा सुनो- गन्धर्वों के राजा जीमूतवाहन बहुत ही दयालु परोपकारी तथा सत्यवादी थे। छोटी आयु में ही उन्होंने अपना राज्य अपने भाइयों को सौंप दिया तथा पिता की सेवा करने के लिए उनके साथ जंगल में चले गये।
एक दिन जंगल में भ्रमण करते हुए जीमूत वाहन ने एक वृद्ध स्त्री को जोर-जोर से रोते हुए देखा। जीमूतवाहन ने उनके पास जाकर रोने का कारण पूछा-, "वृद्ध स्त्री, जो कि नागवंश की माता थी, ने रोते हुए बताया- इस जंगल में पक्षियों के राजा गरुड़ का आतंक है। नागों और गरुड़ के बीच यह समझौता हुआ है कि गरुड़ को भोजन की तलाश में भटकना न पड़े, इसलिए हर रोज नाग वंश का एक नाग स्वयं उनके भोजन के रूप में उनके पास जाएगा। आज मेरे इकलौते पुत्र शंखचूड़ की बारी है। आज गरुण उसे खा जाएँगे, इसलिए मैं रो रही हूँ।" यह सुनकर जीमूतवाहन को बहुत दया आई। उन्होंने वृद्धा को ढाढ़स बँधाया और कहा-, "आप दु:खी मत होइए, आपके पुत्र के प्राणों की रक्षा मैं करूँगा। आज आपके पुत्र की जगह लाल कपड़े में स्वयं को ढककर बध्यशिला पर बैठूँगा, जहाँ गरुड़ भोजन करने आते हैं। जीमूतवाहन यथा समय लाल कपड़ा ओढ़कर बध्य शिला पर लेट गए। गरुड़ आए और उन्होंने जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाया और उड़कर एक पहाड़ी की चोटी पर बैठ गए। जब गरुण उन्हें खाने लगे तो उन्होंने देखा कि शिकार न तो चिल्ला रहा है और न हीं डर रहा है बल्कि चेहरे पर शान्ति है। गरुड़ ने चकित होकर जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा! जीमूतवाहन ने पूरा सत्य बता दिया। जीमूतवाहन के इस आत्म-त्याग साहस और दयालुता को देखकर गरुड़ बेहद प्रभावित हुए। गरुड़ ने कहा, "हे महान पुरुष! आपकी परोपकार की भावना से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मैं आपको प्राणदान देता हूँ। माँगे आप क्या वरदान माँगना चाहते हैं।"
जीमूतवाहन ने कहा-, "यदि आप प्रसन्न है तो मुझे यह वरदान दीजिए कि आप आगे से किसी भी नाग का शिकार नहीं करेंगे और जिन नागों को आपने खा लिया है, उन्हें जीवित कर देंगे।" गरुड़ देव ने जीमूतवाहन की यह बात मान ली और नागों को पुनर्जीवन प्रदान किया, साथ ही भविष्य में किसी भी नाग को न मारने का वचन दिया। जीमूतवाहन के इस त्याग से नागवंश की रक्षा हुई और कई माताओं के पुत्र जीवित हो गए। तभी से सन्तान की सुरक्षा दीर्घायु और कल्याण के लिए जीमूतवाहन भगवान की पूजा की जाने लगी और यह व्रत जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत के नाम से जाना जाता है।
संस्कार सन्देश -
परोपकार की भावना से जीने में ही संसार का सच्चा सुख निहित है
कहानीकार-
डॉ० #सीमा_द्विवेदी (स०अ०)
कम्पोजिट विद्यालय कमरौली जगदीशपुर, अमेठी (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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