177/2026, बाल कहानी- 07 अक्टूबर
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 177/2026
*07 अक्टूबर 2026 (बुधवार)*
#बाल_कहानी - #सच_की_ताकत
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एक दिन अनुशासित मुनिया अंग्रेजी का होमवर्क करना भूल गई। उसे महात्मा गांधी पर दस वाक्य लिखने थे। रास्ते में उसे याद आया तो उसने बेचैन होकर राजू को बताया। राजू ने सलाह दी कि, "अंग्रेजी का पीरियड आने से पहले वह अपना होमवर्क कर ले।"
"नहीं, राजू! मेरी क्लास में पहला पीरियड अंग्रेजी का ही है तो कोई बहाना बना दे लाइट का या फिर बीमारी का।" कुछ भी मुनिया को समझ न आया कि वह क्या करे। इसी उधेड़बुन में वह स्कूल भी पहुँच गयी। असेंबली समाप्त हुई और अंग्रेजी की क्लास आरम्भ हो गई। टीचर सबका होमवर्क चेक कर रही थी। जब मुनिया का नंबर आया तो उसने न तो झूठ बोला और न ही कोई बहाना बनाया। टीचर को मुनिया से यह अपेक्षा नहीं थी। उन्होंने मुनिया को सबके सामने कड़ी डाँट लगायी।
छुट्टी होने पर दोनों घर की ओर चले। मुनिया की चाल में आज वह उत्साह नहीं था। दादी को जब पूरी बात पता चली तो उन्होंने मुनिया को गले से लगा लिया, "अरे, मुनिया! जिस व्यक्ति के ऊपर दस वाक्य लिखने थे, उन्होंने अपने जीवन में कभी झूठ बोला क्या? आज तुम दोनों मोहनदास की कहानी सुनो और मुनिया तुम पछताना छोड़कर यह सोचो कि तुमने झूठ का सहारा नहीं लिया और गांधी जी के आदर्शों पर चली।... महात्मा गांधी (मोहनदास करमचंद गांधी) का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उनके पिता कर्मचंद गांधी पोरबंदर रियासत के दीवान थे। माँ पुतलीबाई एक धार्मिक और सरल स्वभाव की महिला थी। बचपन में मोहनदास पर उनकी माँ के धार्मिक संस्कारों और सिद्धान्तों का गहरा प्रभाव पड़ा। बाल्यकाल में मोहन दास कोई असाधारण या बहुत तेज विद्यार्थी नहीं थे। वह एक सीधे-साधे शर्मीले और संकोची स्वभाव के बालक थे। स्कूल से छूटते ही वे सीधे घर भाग जाते थे, ताकि उन्हें रास्ते में किसी से बात न करनी पड़े या कोई उनका मजाक न उड़ाये। बचपन में मोहनदास ने श्रवण पितृभक्ति नाटक और सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र का नाटक देखा। राजा हरिश्चन्द्र के सत्य और कड़े त्याग में उनके बालपन पर इतनी गहरी छाप छोड़ी कि वे अक्सर सोचते कि हर कोई हरिश्चन्द्र की तरह सत्यवादी क्यों नहीं बन सकता?
इस घटना ने उनके भीतर सत्य के प्रति जीवन भर की निष्ठा बीज रूप में बो दी। किशोरावस्था में अपने भाई का कर्ज चुकाने के लिए महात्मा ने अपने भाई के सोने के कड़े में से एक छोटा-सा टुकड़ा काट कर भेज दिया। काम तो हो गया लेकिन इस चोरी के बाद उनका मन ग्लानि और अपराध-बोध से भर गया। उन्होंने तय किया कि वह अपने पिता से सब सच बता देंगे लेकिन मुख से कहने की हिम्मत नहीं हुई। इसलिए उन्होंने एक कागज पर अपनी पूरी गलती लिखी और भविष्य में कभी ऐसी गलती न करने की प्रतिज्ञा की। जब उन्होंने यह पत्र अपने बीमार-पिता को सौंपा तो पत्र पढ़कर पिता की आँखों में आँसू छलक आये। उन्होंने मोहनदास को डाँटने के बजाय पत्र फाड़ दिया और शान्त बने रहे।
पिता के इस मौन प्रेम और अहिंसात्मक क्षमा ने मोहनदास के दिल को छू लिया। यहीं से उन्होंने जाना कि सच्चे दिल से स्वीकार की गई गलती और अहिंसा में कितनी ताकत होती है! इन बाल सुलभ अनुभवों और घर के धार्मिक माहौल में एक शर्मीले बालक मोहनदास को आगे चलकर दुनिया का महान महात्मा बनाने की नींव रखी, जो बाद में राष्ट्रपिता कहलाये।
#संस्कार_सन्देश -
सत्य का साथ कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए, चाहे कितनी भी विषम परिस्थितियाँ क्यों न हों।
कहानीकार-
डॉ० #सीमा_द्विवेदी (स०अ०)
कम्पोजिट विद्यालय कमरौली जगदीशपुर, अमेठी (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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