179/2026, बाल कहानी- 09 अक्टूबर
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 179/2026
*09 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)*
#बाल_कहानी - #अनन्त_चतुर्दशी_की_कथा
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एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। सब जगह से ऋषि-मुनि आये। वहाँ महर्षि वेदव्यास भी आये। पाँडवों को दु:खी देखकर युधिष्ठिर ने पूछा, "महर्षि! हमारा दु:ख कैसे दूर होगा?" महर्षि बोले, "तुम सब अनन्त भगवान का व्रत करो। भादों सुदी चतुर्दशी को अनन्त चतुर्दशी कहते हैं। इस दिन अनन्त भगवान यानी भगवान विष्णु की पूजा होती है।" युधिष्ठिर ने पूछा, "इसकी कथा क्या है?" तब वेदव्यास जी ने ये कथा सुनाई- सुमंत नाम के एक ब्राह्मण थे। उनकी बेटी थी सुशीला। सुशीला बड़ी हो गई तो सुमंत ने उसका विवाह कौण्डिन्य ऋषि से कर दिया। कौण्डिन्य ऋषि बहुत गरीब थे। विदाई के समय सुमंत ने अपनी बेटी को कुछ नहीं दिया। सुशीला अपने पति के साथ चली गई। रास्ते में उन्हें एक जगह बहुत सी औरतें सुन्दर वस्त्र पहन कर पूजा करती दिखीं। सुशीला ने पूछा, "तुम क्या कर रही हो?" वे बोलीं, "हम अनन्त भगवान का व्रत कर रहे हैं। इससे पति की उम्र लंबी होती है और घर में धन-धान्य आता है।" सुशीला ने भी वहीं व्रत का संकल्प ले लिया और चौदह गाँठ वाला अनन्त सूत्र अपनी बाजू पर बाँध लिया। कौण्डिन्य ऋषि ने जब वह धागा देखा तो गुस्से में बोले, "तूने ये क्या बाँध लिया है? तू मेरी गरीबी से शर्मिन्दा है?" और उन्होंने वो अनन्त सूत्र तोड़कर आग में फेंक दिया।
बस! उसी पल से उनका सब कुछ बिगड़ने लगा। उनका घर-बार, धन सब नष्ट हो गया। वे दर-दर भटकने लगे। तब सुशीला रोने लगी और अनन्त भगवान से क्षमा माँगने लगी। तभी जंगल में उन्हें एक बूढ़ा ब्राह्मण मिला। वह और कोई नहीं, स्वयं अनन्त भगवान थे। उन्होंने कौण्डिन्य ऋषि को दर्शन दिए और कहा, "तुमने मेरा अपमान किया है। तुमने अनन्त सूत्र को तोड़ा है।" कौण्डिन्य ऋषि को अपनी गलती का एहसास हुआ। वे चौदह साल तक लगातार अनन्त चतुर्दशी का व्रत करते रहे और अनन्त सूत्र को धारण किया।
चौदह साल बाद अनन्त भगवान की कृपा से उन्हें सब कुछ वापस मिल गया- धन, वैभव, सुख। भगवान बोले, "अनन्त मैं ही हूँ। मैं ही सृष्टि का आदि और अन्त हूँ। जो भादों सुदी चतुर्दशी को चौदह गाँठ का अनन्त बाँधकर मेरी कथा सुनता है, उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।" यही कारण है कि इस दिन भगवान विष्णु के अनन्त रूप की पूजा होती है और बाजू पर चौदह गाँठ वाला अनन्त सूत्र बाँधा जाता है। बोलो- अनन्त भगवान की जय!
#संस्कार_सन्देश -
अनन्त का मतलब है- जो कभी खत्म नहीं होता। हमारा अहंकार, हमारा गुस्सा, हमारा धन खत्म हो जाता है, पर भगवान का दिया हुआ साथ और अच्छे संस्कार कभी खत्म नहीं होते।
कहानीकार-
#मिथुन_भारती (स०अ०)
प्राथमिक विद्यालय बौखर
वि० क्षे०- सरीला, जनपद- हमीरपुर
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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