विभाजन विभीषिका
टूटे सपनों की एक कहानी
नयनों में ला देती पानी।
देश की गरिमा की खातिर
वीरों ने दी थी कुर्बानी।
विभाजन की विभीषिका ने
हर ली सारी खुशी सुहानी।
बड़ी दुखद थी वह रात
जिस दिन घटित हुई यह बात।
धरती काँपी, अम्बर काँपा
लेकिन बात गई न मानी।
बुझा दीप सौहार्द्र का देश से
चंद लोगों ने की मनमानी।
आओ फिर से करें विचार
गिर जाए नफरत की दीवार।
विभाजन से लेकर के सीख
इंसानियत की फसल उगानी।
रचयिता
डॉ0 निशा मौर्या,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मीरजहांपुर,
विकास खण्ड-कौड़िहार-1,
जनपद-प्रयागराज।

Comments
Post a Comment