126/2025, बाल कहानी- 13 अगस्त


बाल कहानी - अपना हक
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यह कहानी उन गरीब बच्चों की है जो उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। इन बच्चों के पास आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण वह सुख-सुविधा नहीं है, जो मोंटेसरी या इंग्लिश मीडियम के बच्चों को मिलती है। उनके माता-पिता रोजी-रोटी के लिए मेहनत मजदूरी करते हैं। इनका पालन-पोषण करते हैं और गाँव के ही विद्यालय में अपने बच्चों को पढ़ाते हैं। उन्हें कोई चिन्ता नहीं रहती, क्योंकि इन विद्यालयों में सारी सुख-सुविधा मिलती हैं जैसे- खाना, ड्रेस किताबें और पढ़ाई। 
अचानक ही एक आदेश आ जाता है कि स्कूलों को मर्ज कर जाएगा। जहाँ पर बच्चे कम हैं और अध्यापक ज्यादा है। अधिकतर लोग अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ाते हैं लेकिन जिनकी आर्थिक स्थिति जरा-सी भी ठीक नहीं है और वह परिश्रम करते हैं तो वह अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम में नहीं पढ़ा सकते। उनका नामाँकन प्राइमरी विद्यालय में ही होता है। आदेश आने के बाद यह लाचार बच्चे पढ़ाई से वंचित न रह जाएँ क्योंकि यह बच्चे तीन-चार किलोमीटर दूर नहीं जा सकते। रास्ते में कोई भी हादसा हो सकता है। इसके लिए आवाज तो उठानी ही पड़ेगी। जब ऐसा देखा हमने, तो हम विद्यालय पहुँचे, वहाँ बच्चे सारे रो रहे थे और उनके माता-पिता का यही कहना था कि, "हम अपने बच्चों को दूर के स्कूल में नहीं भेजेंगे।" उन बच्चों की मासूमियत हमारे दिल को छू गई क्योंकि अपने हक की लड़ाई जब हमने देश आजाद करने के लिए लड़ी थी, उसके बाद संविधान में बाल शिक्षा को महत्व दिया गया और हर गाँव में विद्यालय खोल दिए गए ताकि कोई भी बच्चा पढ़ाई से वंचित न हो जाए और माता-पिता लड़कियों को दूर के स्कूल में नहीं भेजते थे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बालिका शिक्षा का रहा और बालिकाएँ कामयाब हुई लेकिन मर्जर स्कूल को कर दिया जाएगा, इससे सारे बच्चे टूट गए। अध्यापकों को दूसरे स्कूल में जाना पड़ा, क्योंकि वह सरकार के बन्धन में हैं। उनका आदेश का पालन करना पड़ेगा। लेकिन शिक्षामित्र को मात्र दस हजार रुपए मिलते हैं। वह अपना गाँव छोड़कर नहीं जा सकते। शिक्षामित्र ने अभिभावकों से बातें की, मीटिंग की और अधिकारियों के पास अपनी बात को रखा कि यदि छात्र संख्या बढ़ा दी जाए तो स्कूल मर्ज नहीं होगा। 
फिर क्या था? एक साथ सभी ने मिलकर हाथ बढ़ाया और अपने हक की लड़ाई के लिए नामाँकन बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी क्योंकि मेरे विद्यालय राजीपुर में सैंतीस बच्चे नामांकित थे, जिसके कारण स्कूल मर्ज हो गया था। लेकिन कड़ी मेहनत और लगन से वर्तमान में तिरेसठ बच्चे नामाँकित हो गए और अब विद्यालय सुचारू रूप से चलने में सक्षम है। अध्यापक अभी आये नहीं है लेकिन अभिभावक और शिक्षामित्र पूरी लगन के साथ अपने विद्यालय को चला रहे हैं। मिड-डे-मिल नहीं मिलता, कोई बात नहीं लेकिन यदि हम आदेश का पालन कर दूसरे विद्यालय में चले जाते तो जो सैंतीस बच्चे पढ़ाई के लिए तत्पर थे, वह अपनी आर्थिक स्थिति के कारण न तो इंग्लिश मीडियम में जा सकते थे और न ही दूर के स्कूल में। बच्चे इधर-उधर घूम रहे थे। उन सैंतीस बच्चों को रोका। विद्यालय खोलकर और नामाँकन को बढ़ाया तो सफलता हासिल हुई। आज बहुत प्रसन्नता हो रही है कि हम भारत के नागरिक हैं और अपने हक की लड़ाई के लिए हम हमेशा तैयार हैं, क्योंकि बाल शिक्षा में निशुल्क शिक्षा अनिवार्य है 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए। इसके लिए हमें आगे आना पड़ेगा और हम आये और मर्ज होने से अपने विद्यालय को बचा लिया। आज विद्यालय परिसर में पचास बच्चे रोज आते हैं और उनको शिक्षा का लाभ दे रही हूँ। आदेश अभी आ जायेगा तो विद्यालय में मिड-डे-मिल भी चालू हो जायेगा। खाना की जरूरत नहीं है। अभिभावकों ने कह दिया कि, "दो रोटी के लिए तो हम कमाते हैं। आप हमारे बच्चों को पढ़ाने का कार्य करिए।" 
आज विद्यालय भरपूर मात्रा में खुशहाल जीवन जी रहा है। यह सब देखकर मुझे बहुत खुशी हुई कि मेहनत का फल हमेशा मीठा होता है और जिस लक्ष्य को पाने के लिए मन में ठान ली जाती है और अपने हक की लड़ाई के लिए जो निश्चिन्त होकर कार्य करते हैं। जीत हमेशा उनको मिलती है। 

#संस्कार_सन्देश -
हमें अपने हक की लड़ाई के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए और जागरूकता रखनी चाहिए ताकि अपने हक की लड़ाई शान से लड़ें।

कहानीकार-
#पुष्पा_शर्मा (शि०मि०)
प्रा० वि० राजीपुर, अकराबाद
अलीगढ़ (उत्तर-प्रदेश)

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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