136/2025, बाल कहानी- 27 अगस्त


बाल कहानी - विदाई
----------------------
हर रोज की तरह गौरव अपने जिम्मेदारी भरे दैनिक विद्यालयी क्रियाकलाप, जिन्हें वह जनरल माॅनीटर के रूप में विगत तीन वर्षों से अनवरत समर्पण व सयानापन का भाव हृदयंगम कर करता आ रहा था, अब बुझे-बुझे मन से सम्पादित करने लगा। रुँधा हुआ गला, उदासी लिए नेत्र व भारी सी चाल-ढाल आज उसके हाल-ए- दिल को यों ही बयाँ कर दे रहे थे। 
बचपन में ही पिता के साये से वंचित गरीब परिवार का यह बालक पहली बार बूढ़ी दादी की पीठ पर चढ़कर आँगनवाड़ी की कक्षा में नामांकित होने विद्यालय परिसर में पहुँचा था। धीरे-धीरे स्वत: ही इसका आकर्षण विद्यालय के प्रति बढ़ता गया। निर्धन परिवार की विवशता तथा पिता की छत्र-छाया के अभाव ने उसे कम उम्र में ही काफ़ी समझदार व कर्मशील प्रकृति का बना दिया। 
तीसरी कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते उसके समर्पण व स्व-अनुशासन का ऐसा असर हुआ कि अनेक वरिष्ठ साथियों के बावजूद स्कूली बच्चों द्वारा उसे विद्यालय का जनरल माॅनीटर चुन लिया गया। उसके मृदुल, आज्ञाकारी एवं अनुशासनप्रिय व्यवहार का पूरा स्टाफ भी कायल हो गया। 
नित्य प्रार्थना सभा से लेकर विद्यालय बन्द होने तक समस्त शिक्षणेत्तर गतिविधियों का संचालन व सम्पादन वह पूरी तन्मयता से करता तथा अन्य बच्चों से करवाता। अक्सर वह बहुत जरूरी होने पर ही अवकाश पर रहता था। 
विद्यालयी सत्र के अन्तिम दिवस पर आज अन्य साथियों के साथ ही उसे भी कक्षा पाँच उत्तीर्ण की टी.सी.व मार्कशीट मिलनी थी ताकि वह भी आगे की पढ़ाई के लिए अन्यत्र जूनियर पाठशाला में जा सके। सहपाठी बच्चे जहाँ पास होने की खुशी व दूसरे विद्यालय में जाने की व्यग्रता से आज बल्लियों उछलते हुए दिखाई दे रहे थे, वहीं गौरव गमगीन व गम्भीर-सा हुआ जा रहा था। जी.एम.पद का त्याग व इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक एवं शिक्षकों के वरदहस्त व सहयोग का विछोह उसे अन्दर से खाए जा रहा था। इस विद्यालय की बदौलत ही वह जी तोड़ मेहनत करते हुए अनेक रैलियों व कार्यक्रमों में शिक्षकों के साथ जिले एवं राज्य स्तर तक प्रतिभाग कर चुका था और अनेक शहरों व नगरों के दर्शन कर पाया था। वह बहुत कुछ जान सका था। 
शिक्षकों ने सदैव उसके प्रति सकारात्मक व सहयोगी रुख बनाए रखा, जिसने उसके मनोबल को बढ़ाया और उसके भीतर आत्मसम्मान की भावना को प्रबल किया। विदाई के पलों में आज मध्याह्न भोजन में तैयार विशेष भोज को ग्रहण करने के उपरान्त प्रधानाध्यापक महोदय द्वारा सभी उत्तीर्ण छात्र-छात्राओं को शुभ-कामनाएँ प्रदान करते हुए अंक-पत्र व प्रमाण-पत्र दिये जाने लगे। ज्यों ही अन्त में गौरव का नंबर आया, वह जोर-जोर से रूदन करने लगा । काँपते हाथों से पत्रों को पकड़ वह अब भारी डग भर सिसकते हुए घर की ओर जाने लगा। डबडबाई आँखों से सभी शिक्षक किंकर्तव्यविमूढ़ से बन बस उसे देखे जा रहे थे... देखे जा रहे थे.....।

#संस्कार_सन्देश -
हमें अपने गुरुजनों द्वारा सिखाये गये संस्कार और मार्ग को कभी नहीं भूलना चाहिए।

कहानीकार-
#दीवान_सिंह_कठायत (प्र०अ०)
रा०आ० प्रा० वि० उडियारी 
बेरीनाग, पिथौरागढ (उत्तराखण्ड)

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

Comments

Total Pageviews