मेरे सपनों का भारत

शेष रह गए बीज अनेकों, सुन्दर वृक्ष बनाने को।

इन नन्हीं दीपों की पंक्ति से, एक सुन्दर राष्ट्र सजाने को।।


अभी अधूरा है एक सपना कि भारत अपना सिरमौर बने।

भारत की प्रत्येक दिशा में, राष्ट्र-प्रेम की अलख जगे।।


नैतिकता का हो प्रसार, हर व्यक्ति में फिर एक राम दिखे।

नहीं असुरक्षित हों महिलाएँ, जन-जन से इतना मान मिले।।


अपराधों की कम हो संख्या या उनका स्तर 'शून्य' मिले।

नहीं करे कोई छल बेईमानी, संस्कृति से अपनी रहें जुड़े।।


प्रकृति से हो स्नेह सभी को, मानवता का हम पाठ पढ़े।

स्वर्ग सरीखा हो अपना देश, मन आशाओं के गीत बुने।।


शिक्षा पहुँचे बिन भेदभाव के, न धनी-निर्धन का भेद पले।

अंतर न हो किसी वर्ग में भी, सबके नयनों में स्वप्न जगे।।


अभी दूर  मंजिल है अपनी, लक्ष्य बहुत  यह जटिल दिखे।

पर 'अंधकार को सूरज ही हरता', स्मृति तो अपनी यही कहे।।


'शिक्षक' बहुरत्नों से पूर्ण खजाना, जो छू ले उसको चमक मिले।

सुराष्ट्र कोई तब ही बन सकता, शिक्षक जब सन्मार्ग चले।।


रचयिता
गरिमा सिंह चंदेल,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय चन्द्रवल किशनपुर,
विकास खण्ड-मैथा, 
जनपद-कानपुर देहात।

Comments

Post a Comment

Total Pageviews