बचपन की यादें

सोच रहा है दिल मेरा

क्यों न खुद से कुछ आज कहूँ?

भूले-बिसरे वो बचपन के दिन

क्यों न उनको फिर याद करूँ?


बंद पड़े यादों के बक्से

क्यों न अब फिर से खोलूँ मैं?

देख पुराने गुड्डे-गुड़िया

क्यों न उनके संग खेलूँ मैं?


कुछ कंचे, सिक्के, बर्तन और कपड़े

क्यों न इनको मैं आज टटोलूँ?

जो टूट गए हैं समय के चलते

क्यों न इनको फिर आज मैं जोड़ूँ?


गुड्डे की बारात ले जाकर

क्यों न गुड़िया को घर ले आऊँ?

गुड़िया के घर आने की खुशी में

क्यों न पिटारे को घर-सा सजाऊँ?


सब रहे अधूरा फिर भी मैं

खुश होकर अपना जीवन जी लूँ

इस उहापोह के दलदल से मैं

अपने मन को आजाद करूँ फिर


मन का एक कोना है खाली-सा

क्यों न संग उसके भी रह लूँ मैं?

बचपन की यादों के जरिए ही

क्यों न अपना कल जी लूँ मैं?


रचयिता
गरिमा सिंह चंदेल,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय चन्द्रवल किशनपुर,
विकास खण्ड-मैथा, 
जनपद-कानपुर देहात।

Comments

Total Pageviews