बसन्त
धरा पावन सी बनी दुल्हन,
होने लगी बड़ी लुभावन।
शीत की पोशाक त्याग,
बसन्त आया मन भावन।
हिम शिखर लगे चमकने
सविता की जब किरण पड़े।
कलित शैवालिनी कल कल बहे,
मुदित होकर आगे बढ़े।
तरु के उर बने चित्ताकर्षक,
उत्कृष्ट पुहुप की लड़ी सजे।
पीत बसन्ती धारण किये,
उर्वी इतराती करती मजे।
खग, पखेरू मुदित हैं विहंग
डोल रहे मद मस्त गगन।
वसुधा का रूप परलौकिक,
धरा अम्बर दोनों हैं मगन।
सतरंगी मंजरी मुस्काती,
पीत वसन धारण कर आती।
प्रातः काल विभा लुभाती,
अंजुरी भर भर है नहलाती।
रचयिता
सन्नू नेगी,
सहायक अध्यापक,
राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय सिदोली,
विकास खण्ड-कर्णप्रयाग,
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

खूबसूरत रचना
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