खुल गए स्कूल
लो खुल गए स्कूल, लो खुल गए स्कूल
लो खुल गए स्कूल, लो खुल गए स्कूल
बगिया बगल की, चहकती थी रोज सबेरे।
आकर सभी वो दोस्त, उड़ाते मजे मेरे।
ले खेल का बस्ता, सभी टेंशन से मैं परे।
बस मम्मी, पापा, दोस्त यही कोर्स थे मेरे।
मन बाग में खिले जो, मुरझा गए वो फूल
लो खुल गए स्कूल, लो खुल गए स्कूल।
करता था दौड़ भाग मैं आँगन में रोज-रोज।
वो मैथ की टेंशन को भगाता था रोज-रोज।
दादी की कहानी को रात भर मैं सोच-सोच,
ख्वाबों की नई दुनिया, बनाता था रोज-रोज।
सपनों की वो तुरपाई, लो हो गयी फ़िजूल
फिर खुल गए स्कूल, फिर खुल गए स्कूल।
न नींद का बंधन था, जगने का न रिवाज।
राजा था अपनी दुनिया का, शाही मेरा अंदाज।
अपनों के संग तख़्त था, अपनों के संग ताज़।
ग्यारह महीनों में बदल गया मेरा मिजाज।
फिर से पढ़ूँगा पाई, निकालूँगा वर्गमूल।
लो खुल गए स्कूल, लो खुल गए स्कूल।
गोदी में तेरे खेलता था जो मेरी मम्मी,
खाता था घूम-घूम कर खाना तेरा यम्मी।
जाऊँगा इसे भूल हाँ जाऊँगा इसे भूल,
माँ खुल गए स्कूल, मम्मी खुल गए स्कूल।।
रचयिता
रघुनाथ द्विवेदी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय चायल,
विकास खण्ड-चायल,
जनपद-कौशाम्बी।

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