रेणी गाँव

मैं निःशब्द मौन...... देखता रहा..।


क्या कसूर था मेरा....?

क्यों ये कहर बरपाया....?

आपदा का नाम देकर...,

आँचल मेरा बहाया......।


यहीं से तो शुरुआत हुई थी,

पर्यावरण बचाने की।

चिपको आंदोलन चलाकर गौरादेवी ने,

मिशाल पेश की जमाने की।


गलेशियर टूटना, सैलाब आना,

निर्दोष जनों का यूँ बह जाना।

त्राहि-त्राहि, खलबली मच जाना,

सुबह सवेरे तांडव होना।


      मैं निशब्द मौन.... देखता रहा.....।


हर दिन की तरह तो आई थी,

उस दिन भी भोर सुहानी।

किसे पता था क्षण भर में,

सब बहा ले जाएगा पानी।


पर्यावरण से छेडछाड़ का,

नाम जिसे दिया है।

मेरी जड़ों को जर्जर करके,

किस बात का सिला दिया है..?


अचानक से विपत्ति का आना,

क्यों दिल दहलाया......?

पल-पल डरते जन मानस,

ये कैसा कोहराम मचाया...?


     मैं निःशब्द मौन....देखता रहा.....।


प्रकृति बचाने की गौरव गाथा,

यहाँ से जिसने चलाई थी।

किस बात की सजा आज....,

कैसी ये रुसवाई थी......?


धोली गंगा, तपोवन, विष्णुगाड़,

नंदादेवी, ऋषिगंगा पर पावर प्रोजेक्ट।

बनाये सुविधा, रोजगार के लिए,

करना पड़ा मौत से कॉन्टेक्ट....।


देवभूमि पर ही क्यों बार-बार,

सैलाब आते हैं........?

भरे नहीं काली यादों के घाव,

फिर से ज़ख्म नए दे जाते हैं।


     मैं निःशब्द मौन..... देखता रहा....।


हिमालयों के साथ झील बनना,

रूह को कँपकँपा जाता है।

ना दिन में चैन है अब...,

ना रातों को सकून आता है।


हे ईश्वर शक्ति देना,

इस असीम दुःख को सहने की ।

मन को आश्वास्त करना सबके,

इच्छा हो रेणी गाँव में रहने की।


पहले ही पलायन इतना,

पहाड़ों से हो चुका सारा।

रही कसर सैलाबों ने भी,

उजड़ा चमन कर दिया हमारा।


    मैं निःशब्द मौन.... देखता रहा....।


रचयिता

बबली सेंजवाल,
प्रधानाध्यापिका,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय गैरसैंण,
विकास खण्ड-गैरसैंण 
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।



Comments

  1. आप की बेहतरीन रचना ने वास्तव में निःशब्द कर दिया है मैम।

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