नागपंचमी का सार

नागपंचमी  सार को, आओ समझें आज।

जन्मेजय के यज्ञ में, हुआ गलत बहु काज।।


आग जले बहु सर्प लख, आस्तिक थे नाराज।

बोले रोको कर्म यह, बिगड़ेगा सब साज।।


नाग यज्ञ की आग में, हुए सर्प निष्प्राण।

सृष्टि विरोधी कर्म यह, कैसे हो कल्याण।।


सर्प सभी हर्षित हुए, लख ऋषि का उपकार।

समझे राजा मर्म यह, त्यागा गलत विचार।।


पावन सावन माह की, थी पंचमी शुभ आज।

सर्प रक्ष के भाव को, समझा सकल समाज।।


नाग पूजने की प्रथा, तब से है स्वीकार।

धर्म सनातन में छिपा, सकल पर्व का सार।।


भाव अन्य यदि देखते, मदद करें बहु नाग।

रक्षा करते खेत की, रखकर उर अनुराग।।


सर्प करें मूषक दमन, पाने को निज भोग।

जिससे रक्षित हो फसल, बढ़ता है उद्योग।।


व्यर्थ सर्प काटे नहीं, ईश्वर रचित विधान।

अपनी रक्षा में डसे, रखें सदा हम ध्यान।।


सृष्टि हितैषी जीव यह, भोले का गलहार।

पूजन करिए प्रेम से, खुशी रहे परिवार।।


इच्छा करता ओम कवि, सुंदर रहे समाज।

रक्षित हो हर जीव जग, यही जरूरत आज।।


रचयिता
ओम प्रकाश श्रीवास्तव,
सहायक अध्यापक, 
प्राथमिक विद्यालय उदयापुर, 
विकास खण्ड-भीतरगाँव,
जनपद-कानपुर नगर।


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