141/2024, बाल कहानी-12 अगस्त

बाल कहानी- ईमानदारी और कर्तव्य निष्ठा
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किसी गाँव में मोहन अपने परिवार के साथ गुजर-बसर कर रहा था। वह एक साइकिल सही करने की दुकान पर पंचर लगता था और जो धनराशि मिलती, उससे अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। 
एक दिन उसकी दुकान पर दो युवक मोटरसाइकिल पर आये और कहा कि-, "इसमें पिक्चर हो गया है। सही कर दीजिए।" मोहन ने 'हाँ' कह दी। वह युवक कुछ देर बाद आने के लिए कह गये। मोहन जब गाड़ी सही कर रहा था, तभी उसकी डिक्की में रूपयों का थैला दिखाई दिया। डिक्की का लॉक खुल रहा था। वह दोनों युवक काफी देर तक नहीं आये। मोहन परेशान हो गया। उनका इन्तजार करते हुए शाम हो गयी। वह रूपयों को वह अपने घर ले गया। अगले दिन जब वह दुकान पर आया तो दोनों युवक उसे बुरा-भला कहने लगे और चोरी का इल्जाम लगाने लगे, लेकिन मोहन ने कहा कि-,"भाई! मैंने आप लोगों का इन्तजार किया था, लेकिन आप लोग नहीं आये। यह रही आपकी अमानत! मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं।" यह देखकर दोनों शर्मिंदा हुए और वहाँ से चले गये। 
कुछ दिन बाद वह युवक वहाँ से गुजर रहे थे। मोहन बेहोश पड़ा था। उन्होंने तुरन्त उसे अस्पताल में भर्ती कराया और उसका इलाज करवाया। मोहन को जब होश आया तो उसने धन्यवाद बोला। दोनों युवकों ने कहा कि-, "आपकी ईमानदारी की जय हो! हम आपको अपने साथ ले जाना चाहते हैं। आप हमारी फैक्ट्री में काम करना पसन्द करेंगे।" मोहन ने 'हां' कह दी और उनके साथ चला गया। उन्होंने मोहन को अपनी फैक्ट्री का सुपरवाइजर बना दिया क्योंकि मोहन की ईमानदारी बहुत अच्छी थी। देखते ही देखते ही फैक्ट्री में मुनाफा होने लगा। सभी प्रसन्न रहने लगे। गाँव में मोहन का बड़ा भाई और भाभी उनसे जलने लगे और कहने लगे कि-, "तुम्हारे पास नौकरी है और यह मकान मुझे दे दो।" मोहन ने कहा-, "यह मकान मेरे पिताजी का है और इसमें हम दोनों का हिस्सा है लेकिन आपकी जैसी मर्जी! आप बड़े भाई हैं, आप ले लीजिए।" पंचायत बैठाकर मुखिया जी के सामने मोहन ने अपने हिस्से का घर भी भैया को दे दिया और अपने परिवार को लेकर शहर चला गया। जब उन दोनों युवकों को पता चला। उन्होंने मोहन को घर दिलवा दिया, क्योंकि फैक्ट्री बहुत तरक्की कर रही थी। ईमानदारी की वजह से अब मोहन अपना खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहा था। 
एक दिन मुखिया जी गाँव में बड़े भैया के घर के सामने से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा कि भैया की हालत ज्यादा ठीक नहीं है। तब उन्होंने कहा कि-, "तुमने अपने छोटे भाई के साथ अच्छा न किया, उससे माफी माँगो।" भैया मोहन के पास पहुँचे और अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में बताया। मोहन ने उनको कुछ धनराशि देकर विदा किया और कहा कि-, "आप हमारे बड़े भाई हैं। जब कभी आपको जरूरत हो, आप यहाँ पर आयें, मैं आपकी हमेशा सहायता करूँगा। ऐसा कहकर दोनों गले लग गये। भाई की आँखों में आँसू आ गये। वे बोले-, "मैंने तेरे साथ अच्छा न किया।" तब मोहन ने कहा कि-, "भैया! भाई का प्रेम बहुत अनमोल होता है। इसे पैसों से नहीं तोला जा सकता है।" भैया ने और वहाँ के सभी लोगों ने मोहन की ईमानदारी की तारीफ की और दोनों का प्यार देखते हुए सभी प्रसन्न हुए। इस प्रकार मोहन अपनी ईमानदारी के कारण अपनी दुनिया में खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगा।

संस्कार सन्देश-
हमें कठिन परिस्थिति में या तो आराम में कभी भी अपनी ईमानदारी को नहीं छोड़ना चाहिए ।

लेखिका-
पुष्पा शर्मा (शि०मि०)
राजपुर, अकराबाद, अलीगढ़

कहानी वाचक-
नीलम भदौरिया
जनपद- फतेहपुर (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद
नैतिक प्रभात

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