137/2024, बाल कहानी-07 अगस्त


बाल कहानी- मित्रता के मायने
---------------------

"आज से हम तीनों पक्के दोस्त हुए।" मध्यावकाश में कहते हुए नरेन्द्र ने विरेंद्र और किशन के गले में अपनी बाहें डालकर सदा के लिए जैसे मित्रता का अटूट संबंध बना लिया था। तीनों साथी नये कालेज की छठी कक्षा में नामांकन कराते हुए ऐसे मिले थे कि बारहवीं तक अटूट मित्रता का धवल अध्याय लिखते चले गये। 
पिता की किराने की दुकान से नरेंद्र नित्य रसभरी टाफियों व कुरकुरे नमकीन का उम्दा स्वाद दोस्तों को चखाता तो ठण्डे क्षेत्र से आने वाला विरेन्द्र काफल, चूख माल्टा नारंगी व घाटी के गाँव का किशन आम, अमरूद, केले व अन्य मौसमी फलों का स्वाद आपस में मिल-बाँटकर उठाने में कभी कमी नहीं करता। प्रार्थना से लेकर छुट्टी होने तक अक्सर सारी स्कूली गतिविधियाँ उनकी एक साथ एक-सी रहती। 
 बारहवीं की परीक्षा के उपरान्त अब जोड़ी विखरने लगी। किशन एच० एम० करने शहर तथा विरेंद्र फौज में चला गया। उधर नरेंद्र उच्च शिक्षा ज्वाइन कर कालेज जाने लगा, जहाँ उसे राजनीति का चस्का चढ़ा। तीनों दोस्तों में फोन से लगातार सम्पर्क बने रहते और अपना हाल आपस में बाँटकर तृप्त होते रहते। अपने व्यवहार व वाक-पटुता से जल्दी ही नरेंद्र छात्र-संघ का सदस्य चुन लिया गया और वह राजनैतिक दाँव-पेंच सीखते हुए एक राजनीतिक दल से भी जुड़ गया। 
कालेज पूर्ण करने के तत्काल बाद पहले पंचायती और बाद में ब्लॉक प्रमुख का चुनाव जीत वह वी० आई० पी० बन गया। उधर किशन होटल में तथा विरेंद्र फौज में सेवा प्रदान कर रहा था। 
राजनीति में छलाँग लगाने, छल-प्रपंच, पाखण्ड की बात उसने कतिपय राजनैतिक गुरुओं से सीखी थी। सफलता के उस अनैतिक गुरु मन्त्र को आजमाते हुए वह जल्दी ही विधायक के पद पर आरूढ़ हो मन्त्री बन गया। अब वह बचपन के उन मित्रों से स्वयं को ऊँचे लेबल का समझ दूरियाँ बनाने लगा तथा अपने समकक्ष लोगों से संबंध स्थापित कर परिवार के साथ राजसुख भोगने लगा और आम लोगों से दूर होता रहा। 
कहते हैं कि कब नसीब दगा दे जाये, कोई नहीं जानता। सदैव विलासी जीवन में जन्मा नरेंद्र का बेटा राजकमल बड़ा जिद्दी व बिगड़ैल स्वभाव का बन गया और अनेक गैरकानूनी व अनैतिक काम करते हुए बाप की छवि को बट्टा लगाने लगा। 
अगले चुनाव में पार्टी द्वारा इन्हें टिकट नहीं दिया गया तो उसने दल-बदल कर लिया, जिससे उसकी और भद पिट गई तथा झटके से जैसे ऊपर चढ़ा था, नीचे आने में भी देर न लगी। 
अब घर में बेटा रोज परेशान करता। एक दिन किसी जुर्म में बेटा जेल चला गया और पत्नी भी चल बसी। नरेंद्र को खाली समय अब काफी चुभने लगा तथा रह-रहकर उसे बचपन के अपने साथियों व गाँववासियों की यादें आने लगीं। मित्रता-दिवस पर गाँव आकर आज वह सभी से मिलता हुआ अपने दोनों दोस्तों से अपनी भूल स्वीकार करते हुए आगे भी उसी तरह जीने की बातें करने लगा, जो समय उन्होंने कभी स्कूली जीवन में जीया था लेकिन दोनों दोस्त अब भी अपनी-अपनी नौकरी पर थे तथा चाहकर भी एक-साथ न रह सकने की विवशता जता रहे थे।

संस्कार सन्देश-
हमें कभी भी अपने इष्ट-मित्रों को नहीं भूलना चाहिए। समय पर यही काम आते हैं।

लेखक-
दीवान सिंह कठायत (प्र०अ०) 
रा० आ० प्रा० वि० उडियारी, (बेरीनाग)

कहानी वाचक-
नीलम भदौरिया
जनपद- फतेहपुर (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद 
नैतिक प्रभात

Comments

Total Pageviews