139/2024, बाल कहानी-09 अगस्त


बाल कहानी- मेहनत का फल
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एक गाँव में एक अमरसिंह नाम का बूढ़ा किसान रहता था। साथ में उसकी पत्नी भी रहती थी। 
थोड़ी-सी जमीन थी। अमरसिंह उसी में खेती करके गुजारा चला लेता था। थोड़ी बहुत जरूरत होती तो गाँव के लोगों से मदद माँग लेता था। गाँव में सब लोग एक-दूसरे की मदद करते थे। 
गाँव शहर से दूर होने के कारण सब कुछ एक-दूसरे की मदद से सम्भव हो पाता था। 
गाँव के ज्यादातर लोगों का काम पशुपालन और मुर्गी पालन ही था। उसी से जीविकोपर्जन होता रहता था। 
अमर सिंह के बेटे शंकर ने गाँव के पास ही दूसरे गाँव के हाई स्कूल से परीक्षा पास की। शंकर चाहता था कि वह आगे की पढ़ाई के लिए शहर में पढ़ने जाए लेकिन वह घर की आर्थिक हालत देखकर कुछ कह नहीं पा रहा था। 
एक दिन उसने अपनी माँ से कहा कि-, "माँ! मुझे शहर जाना है पढ़ने।" यह बात उसके पिता तक पहुँची तो शंकर के पिता अमरसिंह ने शहर जाने के लिए 'हाँ' कह दिया लेकिन पैसा कहाँ से आये? 
शंकर गाँव के साहूकार रविन्द्र के यहाँ गया जो तेल मिल का व्यापार चलाते थे। वह बड़े ही सज्जन व्यक्ति थे। 
अमरसिंह ने साहूकार रविन्द्र के सामने बात रखी तो वह पैसे देने को तैयार हो गया लेकिन पैसे वापस कैसे हों? यह अमरसिंह के लिए चिन्ता का विषय बन गया। 
पैसे मिल गए और शंकर तो शहर चला गया लेकिन अमरसिंह को पैसे लौटाने की चिन्ता होने लगी। 
अब वह एक दिन साहूकार रविन्द्र के पास जाकर बोला-, "मुझे कोई छोटा-मोटा काम दे दो।" साहूकार को अमरसिंह के प्रति सहानुभूति थी। साहूकार रविन्द्र ने अमरसिंह को काम पर रख लिया। 
अमरसिंह रोज मेहनत करता और मालिक रविन्द्र का भरोसेमन्द भी था। धीरे-धीरे कर्ज कम हुआ तो अमरसिंह को घर-खर्च और बेटे को पढ़ाने के लिए भी पैसे मिलने लगे। 
दूसरी तरफ अमरसिंह का बेटा शंकर अपनी पूरी लगन मेहनत और ऊर्जा से पढ़ाई कर रहा था। 
कुछ समय बाद शंकर सफल हो गया और अच्छी नौकरी करके अपने माता-पिता को गौरवान्वित होने का मौका दिया।

संस्कार सन्देश-
मेहनत हमेशा सकारात्मक परिणाम लाती है। कर्तव्य-पथ पर कभी भी निराश नहीं होना चाहिए। कर्म फल अवश्य मिलता है।

लेखक-
धर्मेंद्र शर्मा 
कन्या० प्रा० वि० टोडी-फतेहपुर ब्लॉक- गुरसरांय (झाँसी)

कहानी वाचक-
नीलम भदौरिया
जनपद- फतेहपुर (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद
नैतिक प्रभात

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