140/2024, बाल कहानी -10 अगस्त
बाल कहानी- भाग्य अपना-अपना
--------------------------
बात कल ही की है। स्टेशन पर एक जगह कुछ लोग तमाशा जैसा कुछ देख रहे थे। उत्सुकतावश मेरे कदम अनायाश ही उस ओर बढ़ गये। दृश्य देखकर मैं दंग रह गया।
एक सात-आठ साल का लड़का आसमानी बनियान पहने था। ऊपर गहरे बैंगनी रंग की फुल आस्तीन की स्वेटरनुमा टी-शर्ट जिसकी सभी बटनें खुली थीं। आस्तीनों को कुहनी तक समेटे था। फर्श पर दोनों टाँगों के बीच में पीढ़ा रखकर बैठा था। उसके नन्हें कोमल हाथों में प्लास्टिक की दो स्टिक्स थीं । उनसे अपनी धुन में कुछ बजा रहा था। ऊँचे से पीढ़े के आगे वाले गोड़ा (पाया) में 1/ एक रुपया लिखा हुआ था ।
वह एक लम्बे से अँगौछे से अपनी पीठ पर एक बच्चा बाँधे हुए था। वह उसका छोटा भाई अथवा छोटी बहन हो सकती है, जिसका सिर एक तरफ लटक गया था। आँखें मुँदी हुई थीं। शायद भूख से रो-रोकर सो गया हो? उस लड़के का मासूम चेहरा लोगों की तरफ कुछ उम्मीद से निहार रहा था। लोग अबोध बालक के सधे हाथों में फँसी स्टिक्स से बजने वाली आवाज को तो ध्यान से सुन रहे थे। पर उनकी निगाह पीढ़े पर लिखे 1/एक रुपया की तरफ नहीं जा रही थी। हो सकता है।जान-बूझकर उधर ध्यान न दिया जा रहा हो। मैंने कुछ रुपए उसे दिए तो सभी को सँकोच हुआ। तत्पश्चात सभी ने उन बच्चों को कुछ न कुछ दिया। इतने सारे रुपए देखकर उनके चेहरे पर चमक बिखर गयी। वह सबको दुआएँ देने लगा।
दृश्य देखकर अन्तरात्मा काँप उठी। पता नहीं इन अनाथ-अबोध बच्चों को कब से पेट भर खाना-पानी न मिला हो, कब से समाज इनको ऐसी दशा में देख रहा होगा? समाज भी कितना निष्ठुर हो गया है! देश के, समाज के, हमारे बीच ऐसे नौनिहालों को कोई पूछने वाला नहीं है। हो सकता है सरकारी कागजातों में भी इनका नाम न हो। खेलने-कूदने की उमर है। स्कूल जाने की उमर है, पर भाग्य अपना-अपना। इस उमर में ही अपना तथा अपने छोटे भाई-बहिन का पेट पालने के लिए खुद ही खाने-पीने के इन्तजाम करना पड़ रहा है। जिस उमर में बच्चों को प्यार-दुलार, स्नेह-ममत्व एवं सहारे की सबसे अधिक जरूरत होती है, इन्हें नहीं मिल रहा है। इन्हीं बच्चों में समाज के प्रति नकारात्मक भावना घर कर जाती है। ये आगे चलकर गलत दिशा में मुड़ जाते हैं। इन अनाथ, लावारिस, बेसहारा बच्चों को हमें ही गोद लेना होगा। अनाथालयों में सकुशल पहुँचाना होगा। यह एक नेक एवं पुण्य का काम होगा। देश एवं समाज के हित में होगा।
संस्कार सन्देश-
जिसका कोई न हो, उसका साथ सभी को देना चाहिए ताकि उसे अकेलेपन का अनुभव न हो।
लेखक-
रामचन्द्र सिंह 'सूरज' (स०अ०)
प्रा० वि० जगजीवनपुर- 2
ऐरायाँ- फतेहपुर (उ०प्र०)
कहानी वाचक-
नीलम भदौरिया
जनपद- फतेहपुर (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद
नैतिक प्रभात
Comments
Post a Comment