138/2024, बाल कहानी-08 अगस्त
बाल कहानी- समझ का फेर
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गुब्बारा बङी ही मस्ती से आसमान की ओर उङता चला जा रहा था और बीच-बीच में अपने अन्दर भरी हुई हवा को चिढ़ाते हुए बोलता भी जा रहा था-, "अरी हवा बहन! तुम मेरी बराबरी नहीं कर सकती हो, क्योंकि जिस तरह मैं उङ-उङ कर संसार की सुन्दरता, रंग-बिरंगे फूल, सुन्दर सरोवर, शहर और गाँव तथा हँसते-खिलखिलाते स्कूल जाते बच्चे देख सकता हूँ, उस तरह तुम नहीं देख सकती, क्योंकि तुम तो मेरे पेट के अन्दर बन्द हो।" हवा गुब्बारे की नादानी पर मुस्कुराती और चुप रहती।
इसी तरह कई महीने बीतते गये।गुब्बारे में हवा भरी जाती, वह आसमान में जाता और सैर करके मदमस्त हो जाता तथा हवा का उपहास करता।
परेशान होकर एक दिन हवा ने गुब्बारे को सबक सिखाने की सोची। इसके लिए उसने एक नुकीली चीज़ की मदद ली। हमेशा की तरह गुब्बारे में हवा भरी गयी। गुब्बारा अभी दो-तीन मीटर ही ऊपर उङा ही होगा कि मकान की रेलिंग में लगी सजावटी ग्रिल की नोंक गुब्बारे में हल्की-सी चुभ गयी। गुब्बारे की गति धीमी पङती गयी। वह अधिक ऊँचाई तक नहीं उङ पाया और जमीन पर गिर गया।बच्चे दौड़कर आये तथा जोर-जोर से बोलने लगे कि-, "अरे! इसकी तो हवा निकल गयी है!" गुब्बारे को अपनी असलियत समझने में देर नहीं लगी। उसे समझ में आ गया कि हवा ही तो है जिसके कारण लोग, खासतौर से बच्चे उसे बहुत पसन्द करते हैं।
संस्कार सन्देश-
सफलता प्राप्त करने के बाद हमें उन मददगारों को कभी नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने ऊँचाई तक पहुँचाने में हमारी सहायता की है।
लेखिका-
सरिता तिवारी (स०अ०)
कम्पोजिट विद्यालय कन्दैला
मसौधा (अयोध्या)
कहानी वाचक-
नीलम भदौरिया
जनपद- फतेहपुर (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद
नैतिक प्रभात
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