163/2025, बाल कहानी- 03 अक्टूबर


बाल कहानी - पछतावा
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एक नगर में रामरतन नाम का एक धनी सेठ रहता था। वह बहुत दयालु और बुद्धिमान होने के साथ-साथ सीधा-साधा भी था। वह सोने-चाँदी, हीरा-मोती और रत्नों का धन्धा करता था। कभी किसी निर्धन को देखकर वह उसकी मदद भी कर देता था। किसी गरीब की कन्या की शादी में धनराशि दे देता था। रामरतन के एक बेटा किशुन और एक बेटी पदमा थी, जो कि विदेश में पढ़कर वहीं रहने लगे थे।
एक दिन एक व्यक्ति रामरतन के पास आया और बोला कि, सेठ जी! मैं सगुन हूँ। मेरी पत्नी बहुत बीमार है। आप बहुत दयालु हैं। कहीं से भी रुपए-पैसों का प्रबन्ध नहीं हो रहा है। पत्नी का इलाज कराना जरुरी है। बुखार बढ़ता ही जा रहा है।"
"कितने रुपए चाहिए?" सेठ बोले।
"मालिक! जो दे दें...वैसे इलाज में दो-तीन हजार रूपए तो लग ही जायेंगे। एम्स में जाना है।"
"ठीक है। मैं मुंशी से कहे देता हूँ, ले लेना। मैं बाहर जा रहा हूँ।....मुंशी इसे इलाज के लिए रुपए दे दो।" सेठ ने उस व्यक्ति की बात सुनकर पास में खड़े हुए मुंशी से कहा।
"मालिक की जय हो!" उस व्यक्ति ने सेठ से कहा।
सेठ के जाने के बाद कुछ देर बाद मुंशी रुपए ले आया और उस व्यक्ति को दे दिए। वह व्यक्ति खुशी-खुशी घर लौट आया।
कुछ दिन बाद जब सेठ घर लौटा तो उसने मुंशी से पूछा, मुंशी! उस व्यक्ति की पत्नी की तबियत कैसी है, पता लगा कि नहीं?"
"नहीं सेठजी! मैंने तो आपके कहने पर रुपए दे दिए थे। मैं काम में इतना व्यस्त रहा कि उसकी सुधि ही न रही।"
"चलो, कोई बात नहीं...किसी दिन समय निकालकर मैं स्वयं उसके यहाँ जाऊँगा, बेचारा बहुत दु:खी था।...ठीक है, तुम जाओ..मैं आराम करुँगा।"
"जी, सेठजी!" कहकर मुंशी चला गया। सेठ भी कमरे में जाकर आराम करने लगा।
एक दिन सेठ गाँव में गया। वहाँ जाकर सेठ ने सगुन के बारे में पूछा तो एक वयक्ति ने बताया कि, "सेठजी! सगुन की पत्नी तो कबकी चल बसी। वह भगवान को प्यारी हो गयी।..जाने कहाँ से उसे ढ़ेर सारे रुपए मिल गये। बीमार पत्नी को छोड़कर वह चार-पाँच दिन घर ही नहीं लौटा, जब रुपए खर्च हो गये तो घर आया, तब तक उसकी पत्नी का क्रिया-करम भी हो चुका था। बेचारी को पति के हाथ की लकड़ी भी न मिली।" ये सब सुनकर सेठजी बहुत दु:खी हुए। उन्होंने वहाँ खड़े हुए लोगों की ओर देखा तो सबने यही बात कही, जो सेठ को इस व्यक्ति ने बतायी। सच्चाई जानकर सेठ घर लौट आया। वह सोच रहा था कि, "आज के समय में जाँच-पड़ताल कर ही किसी की मदद करनी चाहिए। हो सके तो स्वयं जाकर सही-गलत का पता लगाना चाहिए ताकि फिर कोई संशय न रहे। काश! यदि मैं स्वयं जाता या मुंशी को उसके साथ भेज देता तो उसकी पत्नी न मरती।.. शायद! होनी को यही मन्जूर था।"

#संस्कार_सन्देश -
संसार में ठगने वाले लोग बहुत हैं। कौन सही है, कौन गलत? इसका पता लगाकर ही किसी की मदद करनी चाहिए।

कहानीकार-
#जुगल_किशोर_त्रिपाठी (शि०मि०)
प्रा० वि० बम्हौरी (कम्पोजिट)
मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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