विज्ञान दिवस

आदिमानव से सभ्य मानव तक

सफर इसने तय कर लिया।

बहुत कुछ खोया, बहुत कुछ पाया,

अनवरत संघर्ष का दामन थाम लिया।।


अभावों में जी रहा था जो,

सपने देख रहा खुशहाल जीवन के।

आखिर एक दिन मिल ही गई मंजिल,

पूरे हुए सपने रोटी, कपड़ा, मकान के।।


कल का आदिमानव था जो,

आज सभ्य बन गया।

प्रगति पथ पर अनवरत चल,

ब्रम्हाण्ड तक पहुँच गया।।


जल, थल, नभ में भी,

निर्बाध चल सकता है।

चन्द्र, मंगल, अन्य ग्रहों में, 

भी पदार्पण कर सकता है।।


अहर्निशि प्रगति पथ पर चल,

निर्मित किए मानव संसाधन भी।

खोलकर सृष्टि की गाँठें अब,

किया असंभव को संभव भी।।


स्थूल से सूक्ष्म तक का, 

सफर इसने तय किया।

मानव संसाधनों को निर्मित कर,

दुनिया मुट्ठी में कर लिया।।


बुद्धि बल निज पौरुष से,

आज शिखर तक पहुँच गया।

विज्ञान के सहारे अब वह,

सृष्टि का द्वितीय ब्रह्म बन गया।।


रचयिता
बी0 डी0 सिंह,
सहायक अध्यापक,
कम्पोजिट विद्यालय मदुंरी,
विकास खण्ड-खजुहा,
जनपद-फतेहपुर।

Comments

Total Pageviews